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एक कैदी की डायरी -51

jail diary of kaidi


मैं लाजो के सामने सहज होने की कोशिश करता, लेकिन मन के कोने में अजीब उलझन चुपके से उससे टकरा जाती। मुझे कुछ उथलपुथल महसूस होती जो मन के उतार-चढ़ाव के लिए प्रेरित करती। मेरी इच्छा थी कि लाजो मेरे मन के हाल को समझे। पर ऐसा स्वतः कैसे हो सकता था?

मैं जानता था कि वह मेरे हृदय की आवाज को भांप रही है, मगर धीरे-धीरे ही सही।

अदृश्य संबंध ऐसे ही होते हैं। तिनके हवा में बिखर जाते हैं, फिर किसी पल जुड़ जाते हैं। जिंदगी में यह चलता रहता है। आसमान पर सफेद रुई के बादलों को देखकर लगता है मानो नीलेपन पर सफेदी छायी है। एक समय ऐसा आता है जब आकाश बादलों की सुन्दर चादर से ढक जाता है। अंत में वर्षा होती है। वर्षा सुहानी होती है।

बेचैनी की परवाह मैं करता हूं। मेरा हृदय बेचैन है। जीवन के अध्याय ऐसे होते हैं जिनपर अक्षरों की स्याही हम स्वयं चलाते हैं। जीवन की उठापटक मुझे चैन से रहने नहीं देती। मैं बीच में पुराने दिनों की यादों में खो गया था, अब भी खो जाता हूं। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि यादें मुझे व्याकुल नहीं करतीं। उनकी गंध निराली होती है। गूंथे हुए पुराने फूलों की माला मेरे लिए अभी नयी है, फर्क सिर्फ उसे पहचानने का है। यादें हमारे लिए अजनबी कभी होती नहीं। उनकी ताजगी सदा बनी रहती है।

बहुत दिन बाद आज मेरे आंसू बहे। ये आंसू भी कमाल के होते हैं। दुख बढ़ जाने पर ज्यादा पिघलते हैं। आंसू खुशी के भी तो होते हैं। मेरे लिए अब खुशी के मायने कहां रह गए हैं। खुशी का कत्ल तो बहुत पहले हो चुका, दिन बस गम के सायों में कट रहे हैं।

शायद मेरी स्थिति ऐसी हो चली है कि मैं शेरो शायरी कर सकता हूं। शायरों के बारे में सुना जाता है कि अच्छे शेर वही लिखते थे जिनकी जिंदगी विषादों को सह चुकी थी।

आंसुओं को छलकने से मैं रोक नहीं सकता। मैं जानता हूं कि मेरी मर्जी कहीं नहीं चल रही। मेरे कब्जे में कुछ नहीं, मैं भी नहीं। मेरा हौंसला टूट रहा है। यह स्थिति पहले जैसी है। फर्क इतना है कि पहले मैं कमजोर था, अब उतना नहीं। अब मैं गिरते आंसुओं को संभाल सकता हूं, रोक नहीं सकता।

खुशी के आंसुओं का मुझे इंतजार है। एक प्रकार हमें डरने पर मजबूर करता है, तो दूसरा उलट है। मैं घबराहट और मजबूरी में भी उलझ गया हूं। दीवार पर सिर पटकने का मन करता है। पर मैं ऐसा कर नहीं पाता। मन कुलांचे मारता है। उसका काम यही है। वह चाहत की लंबी लिस्ट लिए बैठा है।

उस दिन मैं बहुत रोया। जी करता था रोता रहूं। काफी हल्कापन भी लगा, मगर पीड़ा भीतर तक थी। मुझे पता नहीं कि ऐसा क्यों हुआ? लेकिन ऐसा हो गया। छत की ओर देखकर मैं भगवान से कहता रहा कि बस भी करो और कितना सहता रहूंगा मैं। मेरी भूलों को माफी कब मिलेगी या ऐसा कभी नहीं होगा। क्या मैं भ्रम में जी रहा हूं?

इतना समय भ्रम में कट गया।

मुझे एहसास हुआ कि मैं दुनिया को अलविदा कह दूं। इसके कई कारण हैं जिन्हें बताने के लिए लंबा समय चाहिए। मैं इतना समय खर्च करना नहीं चाहता। केवल रिश्तों की उलझन को बड़ा कारण मानता हूं। सबकुछ इसी वजह से हुआ है। क्या खूब हैं रिश्तों का खेल? रिश्ते निभाओ तो दुखी, न निभाओ तो दुखी। दोनों तरफ से समस्या ही समस्या। मैं बीच में फंसा हूं - यह बेबसी का वक्त है।

जारी है...

-हरमिन्दर सिंह चाहल.
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