विराट शब्द भंडार है हिन्दी भाषा की दुनिया में

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हिन्दी भारत की सबसे अधिक लोगों में बोली और समझी जाने वाली भाषा है। इसीलिए इसे आजादी के लगभग दो वर्ष बाद यानि 14 सितम्बर 1949 को राष्ट्र भाषा का दर्जा दिया गया। आज हम जिस हिन्दी का साहित्यिक रुप देख रहे हैं उसे खड़ी बोली कहा जाता है। वैसे हमारे देश के जनमानस में यह भाषा जिस विराट रुप और विभिन्न शैलियों तथा क्षेत्रीय बोलियों और भाषाओं से प्रभावित होकर प्रचलित है उससे इसके प्रवाह और सुन्दरता में कोई बाधा अथवा कमजोरी नहीं आयी। हालांकि हमारे अनेक विद्वान इसे भाषा त्रुटि अथवा हिन्दी के पतन की संज्ञा तक कहने से नहीं हिचकते। फिर भी प्रत्येक भारतीय विशेषकर हिन्दी भाषी लोगों का दायित्व है कि वे इस भाषा की शुद्धता, परिमार्जन और मौलिकता को बनाये रखने के लिए केवल लेखन आदि में ही नहीं वरन आपसी वार्तालाप में यह प्रयास करें कि दूसरी भाषाओं विशेषकर विदेशी भाषाओं के शब्दों के प्रयोग से सर्वथा बचें।

हिन्दी में सरलता और गति बनाये रखने को शब्दों का विशाल भंडार है। जो लोग यह कहते हैं कि वे भाषा में ऐसा करने के लिए उर्दू के शब्दों का प्रयोग करते हैं वे हिन्दी भाषा के अपार शब्द भंडार का थोड़ा ज्ञान एकत्र करने का कष्ट करें तो बहुत ही सरल, स्पष्ट और यथोचित शब्दावली यहां उपलब्ध है। वैसे भारतीय जनमानस में लंबे समय से गहरी पैठ बना चुके कई उर्दू अथवा अंग्रेजी के शब्दों के प्रयोग से हिन्दी उन लोगों में भी बहुत आसान हो जाती है जहां ऐसे शब्द हिन्दी में पूरी तरह से विलीन हो चुके।

भारतीय सिनेमा का कुछ लोग बार-बार उदाहरण देते हैं लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं कि आप पहुंचा-पकड़ के अंगुली ही पकड़ लें। वहां स्थित यह होने लगी है कि हिन्दी को पीछे धकेलकर उर्दू को पूरे जोर से बढ़ावा दिया जा रहा है। अधिकांश डायलाग उर्दू शब्दावली से लबालब होते हैं। उर्दू शब्द होने चाहिएं लेकिन एक सीमित दायरे में। कई फिल्मों में तो संस्कृतनिष्ठ हिन्दी का उच्चारण कराकर उसकी खिल्ली तक उड़ाई गयी है जबकि राष्ट्रभाषा में उनके स्थान पर कई सरल शब्दों का प्रयोग भी संभव था।

हिन्दी भाषी लोग ही हिन्दी को क्लिष्ट भाषा कहकर उससे दूर भाग रहे हैं। एक वैज्ञानिक लिपि आधारित भाषा की वर्तनी में त्रुटियां करने में ऐसे छात्रों को लाज आनी चाहिए जिनकी वह राष्ट्र भाषा ही नहीं बल्कि अधिकांश की मात्रा भाषा भी है।

विदेशों में लोग हिन्दी सीख रहे हैं। वे कम्प्यूटर पर हिन्दी का प्रशिक्षण ले रहे हैं। विदेशी छात्र इसके लिए परिश्रम कर रहे हैं। हमारे नवयुवक कम्प्यूटर पर हिन्दी में काम करने पर पिछड़ रहे हैं। अंग्रेजी सीखनी भी जरुरी है लेकिन उसका तात्पर्य यह नहीं है कि हम हिन्दी को बिल्कुल भूल जायें। हमें हिन्दी भी याद रखनी है। अपनी राष्ट्रभाषा सबसे पहले है। दूसरी भाषायें बाद में हैं।

हमारे देश के राज्यों में अलग-अलग भाषायें हैं। बंगाली, तेलुगु, तमिल, उड़िया, पंजाबी, गुजराती, कश्मीरी, कन्नड़, मराठी आदि। इन सभी भाषाओं का भी सम्मान जरुरी है। हिन्दी के नाम पर इनका अस्तित्व भी खतरे में नहीं पड़ना चाहिए। इसलिए केन्द्र सरकार ने इन भाषाओं की उन्नति के लिए भी राज्य स्तरीय व्यवस्थाओं की स्वीकृति प्रदान करने के साथ दूसरी सुविधायें प्रदान की हैं।

फिर भी हिन्दी हमारे देश की राष्ट्रभाषा है। जहां तक संभव हो हमें लिखने और आपसी वार्तालाप में हिन्दी का ही प्रयोग करना चाहिए।

-जी.एस. चाहल
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2 comments:

  1. हिन्दी के समृद्धि के लिये इस तरह के प्रयास सार्थक एवं सराहनीय है।

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