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कांच का घर



न साहिल है, न किनारा है।
दर्द में दिल भी बेसहारा है।.

साँस लेने को भी हवा न मिली,
फिर भी इस वक्त को गुजारा है।.

जीतने को बहुत ही दिल जीते,
मेरा दिल खुद से आज हारा है।.

रात भर करवटें बदलता रहा,
हाल, बेहाल अब हमारा है।.

रोशनी पास में नहीं आई,
सामने यूँ तो चाँद, तारा है।.

दोस्ती पत्थरों से हो ही गयी,
कांच का जबके घर हमारा है।.

‘देव’ जिनको समझ नहीं गम की,
उनसे मिलना भी न गवारा है।.

-चेतन रामकिशन ‘देव’
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