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उम्र

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मुरझाये फूलों की बरसात में अधूरापन जागा है,
स्नेह की प्यास का अमृत पीने की चाह है,
मन मंद है, मुस्कान कुंद है,
अधरों का सूखापन कुछ कह रहा,
किसी अंधेरी कोठरी के साये में,
चुपचाप, शिथिल सा, मैं अकेला,
खिड़की के पार कहीं से उजाला दिख रहा,
पार जाना है, पार पाना है,

उम्र को निचोड़ नहीं सकता,
सिर्फ बूढ़ी आंखों का सहारा है,
परख रहा जीवन की तंग गलियों को,
मैं सोच रहा कि क्या बहस करुं,
क्यों खुद में सिमट जाऊं?
ऐसा नहीं होगा,
न मैं होने दूंगा,

क्योंकि
जीवन को मैंने नहीं,
जीवन ने मुझे चुना है।

-हरमिन्दर सिंह चाहल.
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