राहुल और उसके दादा



राहुल के किसी करीबी को चोट लगी थी, इसलिये वह जल्दी में था। राहुल से बहुत अरसे बाद बस्ती में मुलाकात हुई।

राहुल पंसारी की दुकान करता था। बीच में काम जमा नहीं तो दिल्ली चला गया था। वहां भी घाटा हुआ। अब फिर से पंसारी बन बैठा।

वह नहीं बदला, उतना ही शर्मीला है, काफी हद तक मेरी तरह। 

उसके दादा की "वैधगीरी" अच्छी चल रही है। राहुल अपने दादा के काम को वैधगीरी कहता है। 

उसका मानना है कि वे दवाई देते-देते मरीज को सख्त हिदायत देने से भी बाज नहीं आते। वह उनके लिये रात में देशी दवाई की पुड़िया और गोलियां तैयार करने में मदद करता है। उसके दादा सुबह से दोपहर चार बजे तक एक कमरे में अपना आसन ग्रहण करते हैं। मरीजों का तांता लगा रहता है। वे अधिकतर दवाई बिना पैसे के देते हैं। 

महिलाओं की संख्या कम नहीं होती, बल्कि वे ज्यादा संख्या में होती हैं। 

दादा जी की आंखें सही सलामत हैं। हां, पढ़ने के लिये बारीक शब्दों में जोर लगाना पड़ता है। वह चश्मे से हल हो जाता है। बुजुर्ग होने पर आंखें साथ उतना नहीं दे पातीं, लेकिन जिंदगी की गाड़ी को हम चाहें तो बेहतर तरीके से बढ़ा सकते हैं। 

राहुल के दादा 80 को पार करने के बाद भी अपने काम में माहिर हैं। उनकी जिंदगी बिना परेशानी के कट रही है। राहुल अभी जिंदगी के गुर सीख रहा है। वह जब पच्चीस पार कर जायेगा तो काफी चीजें समझ आने लगेंगी। 

-हरमिन्दर सिंह चाहल.

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