एक सांस पर टिकी जिंदगी


समंदर की गहराई को नापने की चाह लिये कोई चल दिया। जिंदगी उसकी तपते रेगिस्तान की तरह थी। वह शुष्कता से जी रहा था। मन उसका उसकी हड्डियों की तरह सूख रहा था। चाह थी कि जीवन के अंतिम पल कोई उसका साथ दे। रह रहकर वह मन को कोस रहा था। जानता था वह कि दिन बीत गये थे और पतझड़ होने पर पत्तों का डाल छोड़ना वाजिब है।

यकीन कर वह आगे बढ़ रहा था। यकीन कर वह सांस ले रहा था कि आगे कुछ अच्छा होगा। उसे राहत मिलेगी। दर्द को समेटे हुये उसकी टांगों की लड़खड़ाहट से वह बहुत बेजान लग रहा था। जोश था कभी उनमें। नाचता था कभी वह भी। रोमांच था कभी। जगमगाया करता था वह कभी। तब भी जिंदगी एक सांस पर टिकी थी, आज भी हाल वही है। फिर बदला क्या?

हां, वह वही था पहले भी जो आज है, लेकिन जीवन बदला है। जीवन ने उसे तब बदला था। आज भी जीवन बदल रहा है।

उम्र को जीवन से मिला क्या?

वह सवालों का अंबार लगा बैठा। हल न तब था, न अब है। हार कर वह पेड़ से सटकर बैठ गया। गर्दन झुकी थी। सांस उखड़ी थी। सोचने लगा कि जीवन का मोल क्या है। क्यों वह जिया और मर जायेगा?

ऊपर चिड़ियों का चहकना जारी था। वे फुदक रही थीं। पंख फड़फड़ा रही थीं। फिर वे उड़ गयीं। अब शांति थी। हवा ठहर गयी थी। अंधेरा था। काया निढाल थी। जमीन उसका सिरहाना थी, लेकिन वह वहां नहीं था।

-हरमिन्दर सिंह चाहल.

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