जिंदगी को सुन रहा

जिंदगी अनकही बातों की किताब,
आहटों से परे कुछ नहीं,
विचारों की लड़ी उधार लिये हुए,
दौड़ रही हौले-हौले,
मुस्कान अधूरी या पूरी,
उसके अधरों का सूखापन कायम है,
अपनी उलझी लटाओं को लहराती,
मन उसका हर्षाया,
हां मामूली नहीं जीना,
कठिन नहीं,
उत्सव मना रहा कोई,
जीने की आदत से मरहूम,
खुशी को कह अलविदा,
डग भर चल रहा,
जिंदगी को सुन रहा है,
महसूस कर रहा,
ताकि जिंदगी जी सके।

-हरमिन्दर सिंह चाहल.

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