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कीचड़ भरा रास्ता

बूंदाबांदी रूकने का नाम नहीं ले रही थी। मुझे रास्ते के कीचड़ के कारण कई जगह समस्या हुई। दो जगह तो मैं गिरते-गिरते बचा। मेरे पैर फिसल गये थे लेकिन मैं राह चलते एक व्यक्ति के कारण गिरने से बचा।

यदि मैं गिर जाता तो मेरी कोई न कोई हड्डी जरूर टूटती। मेरे अंदाज से कंधे पर इसका गहरा असर हो सकता था। मैं जानता हूं कि इस कारण मुझे कई दिन अस्पताल में रहना पड़ सकता था। वह मेरे लिये बेहद बोरियत भरा हो सकता था। मैं नर्सों के बीच खुद को पाता, लेकिन कुछ मित्रों के चुटकले मुझे बेकार में सुनने पड़ते जो अस्पताल के बिस्तर पर रहने से भी बोरियत भरे होते।

चिकित्सक का वह आला लिये घूमना मुझे बचपन में जरूर हैरान करता था। मैं उसी तरह लगना चाहता, लेकिन यूनिफार्म अपनी पसंद की पहनने की सोचता। कपड़ों में एकरूपता ठीक नहीं लगती थी। जबकि वह उसकी पहचान होती। मैं आले से किसी मरीज के दिल की धड़कन सुनने की सोचता। सोच सोच ही रही। आला वहीं रहा, उतनी दूरी बनाये हुए। मैं भी उसी तरह रहा, उतनी दूरी बनाये हुए।

एक जगह रास्ते में तेज गुजरती कार के कारण छींटे आये जो मेरे सफेद जूतों को गंदे पानी से तरबतर कर गये। मैं वहां चिल्लाकर अपनी खीज प्रकट नहीं कर सकता था। मैं ऐसा करने पर थोड़ा बेवकूफ भी लग सकता था।

बाद में एक स्थान पर मैं कुछ समय के लिये रूका। अपने जूतों को साफ किया। मुझे मालूम था कि आगे चलने पर फिर  जूतों का हाल बेहाल हो सकता है, लेकिन मैं यही सोच रहा था कि शायद आगे कीचड़ कम होगा।

लेकिन आगे जैसे कीचड़ भरा रास्ता मेरा इंतजार कर रहा था। वहां नंगे पैर और पैंट को घुटनों तक मोड़ कर ही गुजरा जा सकता था। मुझे ठंडे मौसम में अपने जूते-मोजे हाथ में उठाने पड़े। ठंडे कीचड़ से गुजरना पड़ा। वह बहुत लोगों को बेकार लग सकता था। मेरा साथ देने के लिये वहां दो-चार लोग थे जो उसी तरह से रास्ता पार कर रहे थे।

वह दिन वक्त को बरबाद करने जैसा था। मुझे मुश्किल से कीचड़ में गुजरना जरूर पड़ा लेकिन उसके अलावा कोई चारा भी नहीं था।

-हरमिन्दर सिंह चाहल.

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