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बुढ़ापा सूखी नदी नहीं

उम्मीदों के मचान पर मैं बैठा हूं। उम्मीद है मुझे वक्त से कि वह इतना बुरा नहीं रहेगा। बदलेगा वक्त और मेरा जीवन भी। यह मेरे लिए राहत होगी। ऐसी राहत जो जिंदगी की चोटों, दर्दों को एकसाथ समेट लेगी। तब मेरी मुस्कान काफी होगी यह कहने के लिए कि बुढ़ापा सूखी नदी नहीं।

जानते हैं हम कि चमक फीकी पड़ती है और खरोचों से अक्सर चीजें पुरानी लगती हैं। न चहक होती है, न ताजगी। सुस्ती होती है एक झुगमुगी शाम की मानिंद -धुंधली तस्वीर की तरह जिसके किनारे खुरदरे, बेरंग होते हैं। मन करता है उम्र से छुटकारा पाया जाये। मन करता है सांस यहीं थम जाये। मन तो यह भी करता है कि बुढ़ापा न आने दिया जाये।

मैंने जाना है, महसूस किया है कि जिंदगी बेनूर नहीं हो सकती। वक्त के साथ बदलाव होते हैं ताकि एहसास हो सके कि जिंदगी के पल अहम होते हैं। खास है सबकुछ जिसका हमसे नाता है।

बुढ़ापा बहता भी है। गति मंथर है, लेकिन खलबली उतनी ही। कुछ चीजें जरुर थम रही हैं, और आभास भी करा रही हैं कि संगीत अब पहले-सा मधुर नहीं। रौनकें जिंदगी के कैनवास पर व्यवस्थित मालूम नहीं पड़तीं, मगर जो विरासत अबतक इंसान ने सहेजी है उसका सार तो बुढ़ापा ही है।

नदी सूखी नहीं, रेत पर निशान हैं। हरियाली नहीं, मगर पत्तों की अठखेलियां जारी हैं। संगम है यह। संगम है जीवन की नहरों का जिनका मिलन तब भी था, अब भी है, फर्क तो उम्र और वक्त कर गया। किनारों की रेत पर उगे पौधे महक रहे हैं। कह रहे हैं कहानी कि उम्र बीत जाती है, लड़ाई जारी है।

ऐसी उम्र में खुद पर भरोसा सुकून पहुंचाता है। यह उतना आसान नहीं। कहते हैं न कि उम्र सबकुछ सिखा देती है। हौंसले के साथ बुढ़ापा जीकर अपनों का दर्द, रिश्तों की परिभाषा के मायने भी बदल जाते हैं।

बूढ़ा हूं मैं। चुप हूं मैं। जीता नहीं मैं, लेकिन हारा भी नहीं।

-हरमिन्दर सिंह चाहल.

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