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ठुंठ रहा बाकि

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मौसम रुठा, देह थकान लिए,
चीरती गर्मी का दानव,
अट्टाहस जिंदगी का,
मंद-मंद, मंथरता से
नींद सी पगडंडियों से
गुजरता बूढ़ा।

चमड़ी झुलस गयी,
हांफ रहा वह,
रुका तो थमेगा
पैर नंगे ही सही,
जलन सरसरी दौड़ा रही
तलबे से दिमाग तक।

ठिकाना बना नहीं
पेड़ की ओट सही
हरियाली ठंडक ला रही
वहां सूखा है
काया भी शुष्क है,
ठुंठ रहा बाकि।

-हरमिन्दर सिंह चाहल.

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