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चुप्पी

चुप्पी

उथलपुथल भरा संगीत, चुभन और हंसी,
मिश्रित भावनायें पेड़ से उल्टी टंगी,
चीरती आवाजें कहीं किसी कोने में,
भिन-भिन सी धुनें चकरायी हुईं,
यह भ्रम है, हां यह भ्रम है,

सोच-विचार और लहरों की बनावट,
उफनती बातों का गोता,
हार-जीत का संयोग,
और ढेरों चिट्ठियों के बीच मैं,
मेरी उम्र जो अब ढल रही,

छोटा चक्कर, बड़ा चक्कर,
पैर थिरकन से भरे, कंपन सही,
जरा देख लूं दूर कहीं जहां,
इतराया करता था कोई कभी,
आजकल वहां चुप्पी है पसरी।

-हरमिन्दर सिंह चाहल.

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