यात्रा जो महसूस की जा सके

राजधानी में लाल किला

हमारी तैयारी पूरी थी। मैं, मेरा भाई और पिताजी ही दिल्ली घूमने जाने वाले थे। मां वैसे भी घूमने का शौक नहीं रखतीं। वे वे कहती भी थीं कि दिल्ली तो महज सौ किलोमीटर है, घूमना है तो राजस्थान चलो, पंजाब चलो। मैंने कहा कि देश की राजधानी में लाल किला, कुतुब मीनार, जामा मस्जिद, संसद भवन, कनाट प्लेस, इंडिया गेट, मंदिर-गुरुद्वारे और जाने क्या-क्या है। महीनों लग जायेंगे घूमने में और हर जगह को समझने में। हालांकि उसके बाद हमारा प्लान हवाई यात्रा के द्वारा मुंबई पहुंचकर वहां घूमने का था।

दस मिनट बाद ब्रजघाट के गंगा पुल पर थे। उस दिन पूर्णिमा थी, इसलिए गंगा में स्नान करने वालों की अच्छी खासी भीड़ थी। हाइवे पर जाम की स्थिति हो गयी थी।
लगभग तीन घंटे बाद हम दिल्ली की सीमा में प्रवेश कर चुके थे।

ऐसा नहीं था कि हम पहली बार राजधानी आये थे। उससे पहले अनगिनत बार आये, लेकिन इस बार मकसद सिर्फ घूमना था।

लाल किला पहुंचने के बाद मेरे भाई ने कहा कि यह दूर से जितना शानदार लगता है, करीब से उसका कई गुना भव्य है। मुगलकाल की अनेक इमारतें हैं दिल्ली में लेकिन यह अपने में एक मिसाल है। मैंने दीवारों को छूकर देखा तो नया अनुभव हुआ।

हम कुछ देर तक चर्चा भी करते रहे कि आज के जमाने में यदि यह किला बनाया जाता तो किस तरह बनता, कितना खर्चा होता, कितना समय लगता, बगैरह-बगैरह।

शीशगंज गुरुद्वारा लाल किले से कुछ दूरी पर है। वहां हमने दोपहर में लंगर चखा। गुरु के प्रसाद की मिठास आज भी वैसे ही है।

चांदनी चौक को दिल्ली की जान कहा जाता है। मेरे भाई के कुछ मित्र जो दिल्ली में रहते हैं, वे अकसर यहां घूमने आते रहते हैं। मैं बहुत देर तक वहां गुजरते लोगों को देखता रहा। एक विदेशी जोड़ा भारतीय परिधान में घूम रहा था। वे अपने कैमरे से दृश्य कैद कर रहे थे। उनकी मुस्कराहट देखकर साफ कहा जा सकता था कि उन्हें हमारे देश में कितना आनंद आ रहा है।

पिताजी ने बताया कि चांदनी चौक साढ़े तीन सौ साल से अधिक पुराना है। पुराने समय में यहां सड़क के दोनों ओर छाया वाले पेड़ हुआ करते थे। वह जमाना शाहजहां का था। आज सबकुछ बदल गया है।

कुतुब मीनार

मेरे भाई ने इच्छा जाहिर की कि कुतुब मीनार को पास से देखा जाये। हमने हामी भर दी। मेरी उत्सुकता भी बढ़ गयी थी क्योंकि महरौली में स्थित कुतुबुद्दीन ऐबक द्वारा बनाई गयी इस इमारत को केवल तस्वीरों में देखा था। जब हम वहां पहुंचे तो मैंने अपनी गर्दन को ऊपर किया और आसमान की ओर देखा। नीले आसमान में उसकी चोटी शानदार लग रही थी। इतिहास की अच्छी जानकारी रखने वाले पिताजी ने एक रोचक बात बतायी। उन्होंने कहा कि सन् 1206 में कुतुबुद्दीन ऐबक ने निर्माण शुरु कराया लेकिन चार मंजिल पूरी होते ही उसकी मृत्यु हो गयी थी। बाद में इल्तमिश ने बाकी मंजिलों का निर्माण कराया। कुल सात मंजिलों की इस इमारत की तीन मंजिलें सुरक्षित हैं, बाकी क्षतिग्रस्त अवस्था में हैं।

तीन दिन हमने दिल्ली घूमी। संसद भवन गये, राजघाट पर महात्मा गांधी की समाधि देखी, इंडिया गेट पर चने खाते हुए घंटों भ्रमण किया। सबसे मजेदार यह रहा कि अधिकतर पैदल चलने के बाद भी थकान रत्ती भर नहीं हुई। ऐसा लग रहा था कि यहीं इमारतों में मंडराते रहो।

एक डायरी में मैंने कई बातें नोट कीं जो उससे पहले मुझे पता नहीं थीं। इतिहास की मेरी समझ उतनी अच्छी नहीं लेकिन उन तीन दिनों में मैंने दिल्ली का कुछ हिस्सा जान लिया था। मैंने दिल्ली की हवा को करीब से महसूस किया था, स्वाद को चखा था और उन लोगों से ढेरों बातें कीं जो दिल्ली की रग-रग से वाकिफ थे।

-हरमिन्दर सिंह.

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