क्या पता यह आखिरी किनारा हो?





रेत को बहते हुए देखा है मैंने इन नंगी आंखों से। देखा है मैंने पानी को जबरदस्ती करते हुए। तब रेत संघर्ष करती है, पानी उसपर चोट। परिचय होता है यर्थाथ का। कमल की पंखुड़ियां फिसल कर किनारे आ जाती हैं। रेत वहां भी चिपकी है। पानी सूख गया, रेत अभी भी वहीं है।

शांत लगती है, मगर उथलपुथल है कितनी। स्वीकार करना होगा कि उलझन पुरवाई में कभी नहीं खोती। समझना होगा कि एक दिन सब कुछ बह जाएगा, तब न पुरवाई होगी, न पानी लड़ेगा।

किनारों की असमंजस स्थिति मुझे नासमझ बना रही है। पर मैं साफ नहीं धुंधला देखता हूं। क्या पता यह आखिरी किनारा हो?

-harminder singh

No comments