जिंदगी हर बार हार जाती है






















बूढ़ी काकी शांत है। उसे लगता है उसकी सांसें कमजोर पड़ने में समय रहा नहीं। वह कहती है,‘मैं कभी-कभी इस बात को गहराई से सोचती हूं कि हर बार जिंदगी हारती क्यों है?’

काकी ने मुझे भी सोच में डाल दिया। प्रश्न अगर गंभीर हो तो सोचना बहुत पड़ता है। काकी ने यह काम बहुत किया है। मैंने काकी से कहा,‘फिर तो जीवन की जीत कभी होगी ही नहीं। वह हर बार हारता ही रहेगा।’

काकी ने बोलना शुरु किया,‘मृत्यु से भला पार कैसे पायी जा सकती है। मौत अजेय है। उसका आगमन निश्चित है। हमें मालूम है, वह आयेगी और ऐसा होता ही है। जिंदगी और मौत की जंग कमाल की होती है। दोनों को पाला छूने की जल्दी होती है। एक तरफ रोशनी की चमक होती है, तो दूसरी ओर घना अंधेरा। अंधेरा मौत की चांदनी होता है जिसमें सब कुछ थमा सा और बिल्कुल शांत होता है। हम हमेशा रोशनी का हाथ थामना चाहेंगे। अंधेरे से हर किसी को डर लगता है।’

‘जब मैं छोटी थी, रात में घबराती थी। सहमना लड़की की आदत होती है और मैं छोटी बच्ची ही थी। मां सीने से चिपका कर कहती कि काहे का डर, वह कुछ होता नहीं। फिर भी मैं डरती थी। आज मैं अकेली हूं। तब भी अकेली थी। हम केवल बंधनों से घिरे होते हैं, मगर इंसान सदा अकेला ही रहता है, जीता है और मरता है। अंतिम क्षण कितना मजबूत धागा ही क्यों न हो, उसे टूटना ही होता है। क्योंकि यही सच है।’

मैंने काकी को बीच में रोक कर कहा,‘फिर अंधकार ही सच है।’

काकी बोली,‘देखो, अंधेरा मिटाने को प्रकाश का सहारा लिया जाता है। वह हमेशा से रहा है। ज्योति ने उसे केवल कम करने की कोशिश की है। फिर हम जानते हैं कि बाती एक दिन बुझती भी है। जिंदगी का उजाला छिनते देर नहीं लगती। आज पलक खुली है, सब दिख रहा है। कुछ पलों में सब बदल जायेगा। हम तब विदा ले चुके होंगे।’

‘मरने से पहले यादों की पूरी किताब इतनी तेजी से खुलती है कि हम केवल देखते रह जाते हैं। यह सब इतनी जल्दी हो जाता है कि सोच भी पशोपेश में पड़ जाती है। जिंदगी कितनी भी शानदार क्यों न रही हो, उसके सिमटने की बारी आती है। वह थके भी न, तब भी हार जाती है। या यों कहें कि जिंदगी जीत कर भी हार जाती है।’

‘जीवन को अधिकार कभी मिला नहीं कि वह विजेता बनेगा। उसका भाग्य उसके हाथ नहीं। वह केवल धोखा मालूम पड़ता है। इसे छल ही कहा जायेगा कि जो चीज हंसती है, कल उसकी कोई छाया तक न होगी। जिंदगी को समझना आसान नहीं। मैंने शब्दों का हेर-फेर किया। उन्हें तोड़ा-जोड़ा, लेकिन जीवन का हिसाब न लगा पाई। वाकई हम शून्य से आगे बढ़ ही नहीं पायेंगे। शून्य से शुरु और शून्य पर खत्म- कितनी मजेदार पहेली है न।’

मैंने हंसकर कहा,‘हां, सच है। शून्य से शून्य तक। बहुत कुछ, फिर भी कुछ नहीं।’

-harminder singh

3 comments:

  1. शून्य से शुरु और शून्य पर खत्म- ज़िन्दगी की जद्दोज़हद बस इतनी ही है..... संवेदनशील पोस्ट

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  2. ज्योति ने उसे केवल कम करने की कोशिश की है। फिर हम जानते हैं कि बाती एक दिन बुझती भी है

    बिल्कुल सही ...अच्छी पोस्ट

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