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अपने ही अपने होते हैं



बूढ़ी
काकी का जीवन नीरस था। उसकी उम्र हंसने-खेलने की नहीं, ढांढस बांधने की थी। वह ममता को टटोलती नहीं, ममता मायूस भी नहीं, जैसी पहले थी, अब उससे अधिक बहती थी।

यह हकीकत किसी से छिपी नहीं कि बुढ़ापा नम्र हृदय होता है। बूढ़ी काकी का दिल पिघल जाता है। उसकी आंखें छलक रही थीं, इतनी सूखी होकर भी। हृदय मोम है, विचार उसे पिघला देते हैं।

काकी को देखकर मैंने पूछा,‘इतने प्रेम की वजह क्या है?’

काकी बोली,‘यह भाव है जो प्रकट हो जाता है। रोकना बस से बाहर, लेकिन सच यह है कि प्रेम का रुप तुमने साक्षात देखा, मैंने, केवल हृदय ने उसे ढंग से पहचाना है। मेरे जैसे बुजुर्गों के लिये बहुत कुछ मायने रखता है प्रेम का एक-एक शब्द।

मेरे अपने यदि मेरे साथ होते हैं तो वह संसार की सबसे मूल्यवान चीज होती है। उस समय की खुशी के बराबर कुछ नहीं। तुम्हें मैंने स्नेह किया है और मेरे लिये यह वक्त यादगार रहेगा।

प्रेम की वजह अनंत हैं। इसके रुपों की व्याख्या करना इतना आसान नहीं। यह विस्तृत है। बचपन से लेकर आजतक हमने किसी किसी से प्रेम ही तो किया है। शायद इसमें बंधकर ही हमने कठिन रास्तों को चुना, लेकिन सरलता से पार करने में हम कामयाब भी हुए। मां ने औलाद से प्रेम किया, पिता ने भी। रुठने-मनाने का खेल भी यहीं से शुरु हुआ। प्रेम का उदय होता है, तो उसमें गुंजाइश होती है। अपने लाडले को सर आंखों पर बैठाया। पालने में झुलाया, किसी सुख की कमी रहने दी। लाडली भी अपना ही खून थी। उसे भरपूर स्नेह दिया। मगर अंतर की उत्पत्ति भी प्रेम के साथ ही हो चुकी थी। सो फर्क का नजारा भी देखने को मिला। खैर, औलाद का सुख उसे जनने वाले अच्छी तरह जान सकते हैं। मां-बाप और औलाद के बीच प्रेम जमकर हंसा और खूब नाचा।

बूढ़ी काकी की बात खत्म ही नहीं हो रही थी। चूंकि सवाल इतना पेचीदा था कि उसका उत्तर शुरु ही ठीक तरह से कहां हुआ था।

काकी ने आगे कहा,‘औलाद का अपनापन हर किसी पालनहार की ख्वाहिश होती है। चाहत का दामन छूटे इसलिये वे चाहते हैं कि उनकी औलाद उनकी आंखों से दूर हो।

अगर हम युवाओं की बात करें तो इस समय में रिश्तों की एक अजीब उलझन का सामना करने की तैयारी पहले से ही की जाए तो बेहतर है। यह समय रिश्तों के दरकने का भी होता है, डरने-सहमने का होता है, अपनों से दूरी बनने का भी होता है और हां, पतली डोर पर चलने का भी होता है। युवा मन चंचलता लिये होता है, अठखेलियां जमकर होती हैं। जिम्मेदारियों का अहसास कभी होता है, कभी नहीं। मनमौजी कहने में कोई हिचक नहीं है। यह बदलावों का वक्त होता है, शारीरिक भी और मानसिक भी। वास्तव में यह दौर हलचलों का होता है। पर हमने तो बुढ़ापे के प्रेम के विषय में बात की थी, ये अवस्थायें मध्य कहां से गईं।इतना कहकर काकी रुक गई।

-Harminder Singh

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