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भाई बहन की शरारत

किसी ने सोचा भी नहीं था कि दोनों भाई-बहन कुछ हैरान करने वाला करने वाले हैं.

भाई बहन की शरारतउनके पिता अभी कम्पार्टमेंट में नहीं आये थे। ट्रेन रुकी हुई थी और दोनों भाई-बहन डिब्बे में उछलकूद करने में व्यस्त थे। लड़का गोरा था, उसका नैन-नक्श सुन्दर था। उसकी बहन जिसने फ़्राक पहनी थी यही कोई सात-आठ साल की होगी, हमारी शुभी की तरह और भाई की उम्र भी यही कोई 10-11 साल की, हमारे मनी की तरह।

अरे! मनी को यहां पूरी तरह परिभाषित नहीं किया जा सकता क्योंकि उसकी शैतानियों की लिस्ट एक बार शुरु हो जाए तो खत्म ही नहीं होगी। बचपन में जितनी शैतानियां, माता-पिता-पड़ौसियों को मैं टेंशन देता था, उसका कई गुना हमारा मनी यानि मनीष करता है अपने भाई धनी के साथ मिलकर। अगर मैं समय निकाल सकता तो उनके बारे में एक अलग से स्तंभ चलाया जा सकता। वैसे आइडिया बुरा नहीं है।

खैर, ट्रेन में दोनों भाई-बहन इधर-उधर दौड़ने की जुगत में थे। शायद उनका इरादा पकड़ा-पकड़ी खेलने का था। मैंने कैमरा निकालकर उनकी तस्वीर खींचनी चाही तो वे भागकर पीछे सीट पर बैठी अपनी मां के पास जाकर छिप गये। मैं उनके आने का इंतजार करने लगा। कमाल था मुझे मालूम नहीं कि बच्चे शरारती हैं, पर शर्मीले भी। हारकर मैंने कैमरा बैग में रख लिया क्योंकि कैमरे की बैटरी दर्शा रही थी कि वह केवल कुछ तस्वीरें खींच सकती है।

लड़का खिड़की से हाथ बाहर निकाल रहा था। जबकि उसकी बहन कम्पार्टमेंट से बाहर निकलकर प्लेटफार्म पर खड़ी अपने पिता के आने का इंतजार कर रही थी। जब लड़की खिड़की के पास सटकर खड़ी थी, तो लड़के ने उसकी चोटी खींच ली। लड़की चीखी और भाई के हाथ पर अपने दांत गढ़ा दिये। अब चीखने की बारी लड़के की थी। मां की कोई आवाज नहीं आयी। लगता था मां का बच्चों पर भय नहीं होगा।

कुछ देर बाद मैंने देखा कि भाई सीट के ऊपर वाले हिस्से पर बने सामान रखने के स्थान पर चढ़ गया। वह वहीं से चिल्लाने लगा,‘अब मैं उतरुं कैसे?’

उसकी बहन नीचे खड़ी मुस्करा रही थी। वह मां से कह रही थी,‘मम्मी देखो भैया कहां चढ़ा बैठा है।’

मुझे फिर से मां के डांटने या बोलने की आवाज नहीं आयी। वह गूंगी नहीं थी क्योंकि इस घटना के कुछ पलों बाद वह बोली,‘देखो पापा तो नहीं आ रहे।’ लड़की कम्पार्टमेंट से निकलकर फिर प्लेटफार्म पर खड़ी थी। लड़का उतरकर बहन के पास जा पहुंचा।

तभी उनके पिता भी आ गये। बच्चे उनसे देर से आने का कारण पूछ रहे थे।

बच्चों ने फिर उछलकूद प्रारंभ कर दी। ‘हू-हू-हा-हा’ कर मेरे कानों में दर्द कर दिया। ‘धम-धम’ पैरों से करते हुए उधर से इधर उनकी चहलकदमी जारी थी। सच में मैं परेशान हो गया। मेरे हिसाब से बच्चे ‘फुल-आनंद’ ले रहे थे। कूद-फांद तब रुकी जब ट्रेन चलने लगी। मगर उसके बाद भी उनके चिल्लाने और हंसने की आवाजें आती रहीं। शुक्र था ट्रेन की तेज रफ्तार में उनकी ध्वनि मंद होती रहती।

-हरमिंदर सिंह.

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2 comments:

  1. बिल्कुल अपनी सी लगती है यह छोटी सी घटना... तस्वीर खींचने का मौका आप पुनः निकाल लेते तो मजा आ जाता.. बच्चों की शरारतों से ज्यादा खूबसूरत उनका शर्मीलापन होता है. :)

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  2. आपने सही कहा मनीष जी,

    बचपन के दिन सबसे शानदार दिन होते हैं। जिंदगी की सबसे मजेदार घटनाओं के दिन भी यही हैं।

    धन्यवाद,
    हरमिन्दर सिंह

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