दूरी का दर्द

प्रिय मंजुला,.......

मेरे लिए तुम खास हो। शायद तुम में कोई बात है जो मुझे खींचती है। मैं खिंचा चला आता हूं। तुमसे बंधने का मन करता है। एक पल की दूरी ऐसी लगती है मानो साल बीत गए हों। दूर नहीं रहना चाहता, बिल्कुल नहीं। यह अजीब नहीं, बहुत अजीब हो जाता है। दूरी इतना दर्द क्यों देती है? हृदय की धड़कन को मैं समझ सकता हूं। मुझे यकीन है तुम्हारा हृदय भी इसी तरह धड़कता होगा।

तुम्हारा चेहरा, आंखें, लहराते बाल मैं कैसे भूल सकता हूं। मैंने इतना जाना कि मैं अपने जीवन की उदासी को तुम्हारे कारण कम कर सका। मैं खुद को जिंदगी से तोड़ने की कोशिश कर रहा था। मैं बिखर ही रहा था कि तुमने मुझे संभाल लिया। शायद मैं डूबने से बच गया। लड़खड़ाती जिंदगी को सहारा दिया है तुमने।

पर, अब बहुत कुछ बदल गया है। पहले मेरा जीवन तन्हा था। तुमसे वह पहली मुलाकात मामूली थी, लेकिन एहसास करा गयी कि किस तरह दो जिंदगियां एक-दूसरे से प्रभावित होती हैं। संयोग से अगले दिन तुम मुझे दोबारा मिलीं। इस बार दो इंसान मुस्कराये। शायद उस मुस्कराहट में कई जबाव छिपे थे। आंखों से आंखों की टकराहट मुश्किल में डाल रही थी। सच पूछो उस समय मानो ‘कमाल हो गया था, एक बंदा निहाल हो गया था।’

आकर्षण प्रकृति में छिपा है। भगवान ने हर जगह एक अदृश्य चुंबक को रखा हुआ है ताकि संसार में सामंजस्य बना रहे। मैं तुम्हारे आकर्षण में खो गया हूं। इसका कोई उपाय भी तो नज़र नहीं आता।

शायद बहुत कुछ हमारे बस में नहीं होता। हमें फिर भी इच्छाओं के आगे खुद को उन्हें पकड़ने के लिए भागने को कहना पड़ता है। मेरी इच्छा तुमसे मिलने की है मंजुला।

मुझे लगता है जैसे तुम मेरे लिए बनी हो, सिर्फ मेरे लिए। कम लोग होते हैं जो किसी को इतना चाहते हैं। मैं तुमसे जल्द मिलने आ रहा हूं। इंतजार करना।

तुम्हारा,

सिर्फ तुम्हारा

राम

-harminder singh





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