बूढ़े काका, योग और सूखा तिनका

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बूढ़े काका ने सुबह चार बजे मुझे झिंझोड़ कर उठाया। सबसे हैरानी वाली बात यह रही कि रात में समय पर उठने का वादा करने के बाद भी मैं उठ नहीं पाया था। एक बुजुर्ग जो मुझसे कई गुना कमजोर था, वह जवानों की तरह फुर्तिला और जस्बे से भरपूर था। मुझे खुद पर दया और हंसी साथ-साथ आ गयी।

कभी-कभी मुझे लगता है कि बुढ़ापा तो नौजवानों से जवान है; उसे किसी सहारे की जरूरत नहीं। सिर्फ कुछ पलों के लिये वह थका और उदास रह सकता है।

पांच बजे हम दोनों घास के मैदान पर थे जहां चंद मिनटों पहले लोगों का आगमन हुआ था। महिलाओं की संख्या अधिक थी। बुजुर्ग काफी थे, पर युवा लड़के और लड़कियां नजर नहीं आये। अंदाज लगाया तो मालूम चला कि वहां तीस से कम का कोई इक्का-दुक्का ही होगा।

योग प्रशिक्षक ने सामने आसन ग्रहण किया। तीन बड़े तख्तों और बल्लियों की सहायता से एक स्टेजनुमा जगह बनाई गयी थी। उसके ऊपर नारंगी और सफेद रंग का तिरपाल सजाया गया था।

बूढ़े काका को आसन आसान लग रहे थे। उन्हें देखकर दावे के साथ कोई भी कह सकता था कि काका योग के पुराने महारथी हैं। कुछ समय बाद वे योग प्रशिक्षक की जगह थे। अब हमारे सामने दो लोग थे जो वहां मौजूद लोगों को आसन सिखा रहे थे।

मैं अपनी टांगों को सीधा करने की कोशिश कर रहा था। काका ऐसा कर चुके थे। मेरी आंखें उस समय फिर से फैल सकती थीं, लेकिन मैं हैरानी का आदी हो चुका था। मैं गंभीरता से एक-एक क्रिया को करता जा रहा था।

कुछ देर बाद उन्होंने मुझसे कहा -‘तुम हर बार बेहतर कर रहे थे। तुम नियम बनाओगे तो चीजें सरल होंगी।’

मैंने थकान भरे और टूटकर बिखरने वाले शरीर के साथ अपनी गर्दन को हामी में हिलाया।

सूरज की गर्मी मेरी टी-शर्ट को काट रही थी। ऐसा भी लगता था जैसे किरणें नीले कपड़े को भेदकर उसमें सुराख कर देंगी। मैं आसपास खड़े पेड़ों को देखकर और नीचे कालीन की तरह मखमली लगने वाली हरी घास से थोड़ा सुकून महसूस कर रहा था।

काका ने काफी देर तक योग किया और जब मैंने उनका चेहरा देखा तो उसपर पसीने की बूंदे थीं, लेकिन वे बिल्कुल भी थके नहीं थे।

रास्ते में उन्होंने कहा –“तुम यह मत सोचना कि बुढ़ापा जल्दी थक जाता है। बेटा थकता तो मन है, शरीर नहीं।“

काका की उस बात को मैंने अभी तक शब्दशः याद रखा है।

मैंने आसमान को निहारा। वहां नीलापन था। बादलों का एक भी कतरा नजर नहीं आया।

काका बोले -‘वहां खालीपन है। खुलापन है। ऐसा लगता है जैसे सब कुछ अभी शुरु हुआ है। ऐसा तो हो नहीं सकता। मैं खुद खालीपन महसूस करता हूं। यह अभी शुरु नहीं हुआ, अरसे से है। यह भी तो जीवन का एक रंग है, जो कभी उदास होता है, कभी हंसता है, कभी यादों में खो जाता है।’
‘जिंदगी को तुमने हताश देखा है। वह चहकती हुई हवा से बातें करती है तो वही उदासी जिंदादिली बयान करती है। यह सब समय के साथ-साथ उलट-पलट होता रहता है। जीवन बहता इसी तरह है। एक सिरा थोड़ा डूबा हुआ, दूसरा उथला और कुछ समय बाद स्थितियां फिर से तब्दील होंगी। यह परिवर्तन का नियम है।’

बूढ़े काका की गर्दन पर जितनी झुर्रियों को मैं देख पा रहा था उनमें अधिकतर धूप की जद में थीं। पसीने की बूंदें उनमें भरी हुई थीं। जो कुछ था, जो तैरना जानता था, वह बहता हुआ जा रहा था। खारापन कितना होगा, यह भरोसे के साथ कहा नहीं जा सकता था।

वाकई ढलती उम्र खुद को साबित करती है। उसके पास साबित करने के लिए अनगिनत झुर्रियां जो हैं। ऐसा लगता है जैसे पूरा शरीर उनका बन गया हो या वे शरीर को बना रही हैं। शुरु में खत्म कुछ नहीं होता, फर्क इतना है कि वह बूढ़ा हो जाता है। तय समय पर सिकुड़ती हुई जिंदगी अपने में सिमटकर कहीं गायब हो जाती है, फिर लौटकर न आने के लिए।

कभी-कभी यह भी लगता है कि यह जिंदगी जितने मोड़ों से गुजरती हैं, हर बार नये अनुभव समेटकर लाती है। उनसे हम तमाम जीवन सीखते हैं। उन अनुभवों को आने वाली पीढ़ी में बांटकर खुद को खुशनसीब भी मानते हैं। ये छोटी-छोटी सीखें जिंदगी के अगले रास्तों के लिए अहम साबित होती हैं। हम गिरने से बचते हैं, गिरकर संभलते हैं और नये अनुभव समय के साथ हासिल करते हैं।

उम्र छोटी नहीं होती, न बड़ी; वह एक कहानी की तरह बहती है। वहां हर तरह का मौसम होता है। कई बार मौसम खुद के बनाये होते हैं। हवाओं का रुख मुड़ता भी है, मोड़ा भी जाता है।

मेरे पैरों पर घास के कुछ सूखे और हरे तिनके चिपक गये थे। उन्हें हटाने के लिए मैंने अपने पैर को झटका दिया। वे चिपके रहे। एक बार फिर मैंने अपना पैर झटका। इस बार कुछ तिनके छूट गये। मैंने ध्यान दिया तो पाया कि हार मानने वाले वे थे जो सूखे हुए थे। उनमें शायद इतनी पकड़ नहीं होगी या वे ढंग से चिपक नहीं पाये होंगे कि अधिक देर तक कंपन को महसूस कर सकें।

सूखे तिनकों से मुझे बुढ़ापे पर कुछ दिन पहले मेरे द्वारा लिखी कुछ पंक्तियों की याद आयी। मैंने लिखा था -
‘तिनके उदास हैं, बुढ़ापा भी। खामोशी चीरती है, लेकिन आहट बरकरार है। बेचारा एक बूढ़ा आदमी फिर से खुद को परेशान, बेरोजगार, अपमानित महसूस कर रहा है। वह उस सूखे तिनके की तरह है, जो अपना सारा रस गंवा चुका है। उसमें शेष है, तो वह खुद है। वह भीतर से खाली पड़ा हुआ है। न शोर है, न हलचल, सिर्फ खामोशी है।’

मुझे लगता है हर किसी के साथ ऐसा होता है कि वह उम्र के आखिरी पड़ाव पर बहुत कुछ गंवा देता है। सच में वह खुद को धीरे-धीरे मिटता हुआ देखता है। यही बुढ़ापा है। खुद को टूटते हुए, बिखरते हुए और मिटते देखना। मुकाबला करने की जिद अब नहीं, बस अब नहीं, यही कहता है मन क्योंकि बोल तो कब के बुदबुदाना भी छोड़ चुके होते हैं।

-हरमिंदर सिंह.

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