रंगों में जीवन बसता है

बुढ़ापा थका हुआ रंग जरुर है, लेकिन यहां थकान में भी जीवन बसता है। शायद हम जीवन को रंगों में डुबोते रहेंगे या वह डूबता रहेगा। इतना जरुर है कि जीवन भी उसी तरह चहकता रहेगा अपने निराले अंदाज में।
‘रंग कितने अच्छे हैं। मैंने खुद को उनमें भिगोया है। अनगिनत तरह की छीटों से खुद को कैसे बचाती। मोड़ दर मोड़ उनसे सामना होता गया।’ काकी बोली।

मैंने सोचा कि बूढ़ी काकी को जीवन उतना नीरस नहीं लगता। वह छिपाकर कहने की कभी कोशिश नहीं करती। वह हरदम यही चाहती है कि रंग यूं ही बिखरे रहें। ये जीवन के रंग हैं।

‘मुस्कराती आंखों को देखकर भला कौन नहीं ठहरना चाहेगा। अक्सर मुस्कराती चीजें हमारे लिए काफी अहम हो जाती हैं। कई बार हम खुद से कह जाते हैं कि बाहर की छटा कितनी भा रही है। अटपटाहट को परे छोड़ कर आने का मन करता है। तिनकों को, जिनमें थोड़ी मिठास की बूंदें हाल ही में समायी हैं, सिमेटने का मन करता है। तो हम कह सकते हैं कि कितनी तरह के रंगों की छटा हमें देखने को मिलती है। महसूस करते हैं वाकई रंगों को भी।’

इतना कहकर काकी के चेहरे पर भावों ने परिक्रमा शुरु कर दी। झुर्रियां मुस्कराती-सी लगीं। चहक उनमें किनारों से होती हुई गुजरी। जीवन खामोश दिखा, लेकिन उसे महसूस किया जा सकता था। दरअसल यह भी एक तरह का रंग था।

काकी ने कहा,‘जितना सफर मैं तय कर चुकी उसमें रास्ते कितनी दिशाओं में जाते थे। सफर आसान नहीं था, हलचलों से बचना कई बार मुश्किल में डाल देता था। ऐसा अब भी है, पर कुछ दौर गुजर गये, कुछ बाकी हैं। मैं चलती गयी, बस चलती गयी। जीवन ठहरा कहां है। बुढ़ापा थका हुआ रंग जरुर है, लेकिन यहां थकान में भी जीवन बसता है।’

‘चटक रंग असल में फीके थे। यह अंतिम पड़ाव में मालूम चल गया। चटक रंग सुन्दर जरुर थे, पर अस्थिरता की कहानी वे भी कहते थे। हिफाजत करने का जिम्मा इंसान का था। ऐसा हो न सका। नियम तो नियम हैं।’

‘मैं खुश हूं कि मैंने इतने रंगों को देखा, उन्हें महसूस किया। यह खुशनसीबी नहीं तो क्या है, इतने कम समय में कितना कुछ पाया, कितना कुछ खोया, और अब भी खेल जारी है।’

‘शायद हम जीवन को रंगों में डुबोते रहेंगे या वह डूबता रहेगा। इतना जरुर है कि जीवन भी उसी तरह चहकता रहेगा अपने निराले अंदाज में।’

-Harminder Singh


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