सांस अभी बाकी है

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एक वृद्ध का जीवन आड़ी-तिरछी रेखाओं का समावेश है। जीवन की मधुर मुस्कान से परे कष्टों की सूखी घास पर बना एक बिस्तरा है जो चुभता है। खोखली बांसुरी बिल्कुल बेसुरी है, लेकिन थका हुआ संगीत बजता है।

अटपटी बातें कर रहा बुढ़ापा, चुपचाप, निरंतर। किसी मोड़ पर कुछ धीमापन और गहरी सिलवटें। परछाईं अक्सर दूर भागने की है। छिटकती चीज़ों को थामना बेमानी लगता है।

बुढ़ापा करा रहा है एहसास कि रस फीकापन समेटे हैं। गीला था वह सब जो अब सूख चुका। भला हरियाली किस ओट से झांकेगी। ऋतुएं कब की बदल गयीं। मौसम आज उदास है। उम्र ने हताशा को जन्म दिया, और इंसान उम्रदराज हो चला। समय कितना खर्च हुआ, यह वह जान गया क्योंकि उसने एक-एक पल की कीमत चुकायी है। जानता है वह कि बीती उम्र का जायका क्या है?

सूनापन खंदकों की शान है। यहां वही हाल है। घिसी-पिटी कहानी के बदहाल पात्र जिनमें शायद शक्ति नहीं। माहौल में जीने की आदत हो चुकी। दौड़ते वक्त का दामन थामना चाहा, निराशा हाथ लगी।

झुर्रियां, सिर्फ झुर्रियां और जर्जर ख्वाब जिनकी गंध अंधेरे की गहरायी में गुम होने की कगार पर है। फिर भी डटा है बुढ़ापा इसी विश्वास के साथ कि सांस अभी बाकी है।

-Harminder Singh



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