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एक कैदी की डायरी -39

jail diary, kaidi ki diary, vradhgram, harminder singh, gajraulaपिताजी की मृत्यु के बाद नाना मुझे घर ले आए. उनकी बेटी का घर कब का उजड़ चुका. वे उसकी निशानी को खुद से दूर नहीं करना चाहते थे.

नानी एक स्त्री थी जिसकी उम्र कई युगों की बीती हुई लगती थी. वे काफी सोचती थीं. उनके चेहरे की सिलवटें उनकी उम्र के सच्चे दर्शन करातीं. उनके चेहरे पर मंद मुस्कान जरुर रहती, मगर बुढ़ापे की छाया ने उसे नये आकार में हर मुस्कराहट पर अपने अंदाज में प्रस्तुत किया. दातों की बात न करें तो अच्छा है. नानी की बत्तीसी सही-सलामत थी, लेकिन वे मुंह खोलकर कभी हंसी नहीं थीं. भला बुढ़ापे में ऐसे दातों का लाभ कैसा?

मेरे बालों को संवारने में नानी को बहुत आनंद आता. अपने दोनों हाथों से तेल मेरे सिर पर रगड़ा करतीं. रुखे हाथों में स्नेह की कोमलता एक अलग तरह की संतुष्टी प्रदान करती. मुझे देखकर उन्हें अपनी बेटी की याद आ जाती. उनकी आंखें गीली हो जातीं. पर बूंदें वहीं रुक जातीं और वे चेहरे को गंभीर कर लेतीं. मैं उनकी वेदना को समझ सकता था.

भीतर से वह वृद्धा दुखी थी, लेकिन किसी से मन की पीड़ा कहती नहीं थी, अंदर छिपाये रहती. कुछ लोग होते ही ऐसे हैं. वे दुखी तो होते हैं और टूटे हुए भी. नहीं चाहते कि दूसरे उससे प्रभावित हों. सारा दुख खुद ही समेटना चाहते हैं. उनकी इच्छा हमेशा रहती है कि कोई उनकी तरह दिल में दर्द दबा कर न रखे, क्योंकि वे हमारी खुशी चाहते हैं. आमतौर पर ऐसे लोग कम ही होते हैं.

to be contd....

Harminder Singh


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2 comments:

  1. बहुत सुन्दर,सार्थक प्रस्तुति।

    ऋतुराज वसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ।

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  2. interesting , magar bahut kam likha hai ...ye to jaise kahani ka mukhda bhi dekhna naseeb nahi hua ...

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