पुराना, लेकिन वैसा ही

kaka, bodheyबूढ़े काका बीमार थे। उनका हालचाल जानने उनके घर पहुंचा। तब वे नींद में थे।

‘दवाई नींद की है।’ किसी ने कहा। ‘कई घंटे बीत गये। शायद कुछ बोलें।’

मैं इंतजार में बैठ गया। जिस कुर्सी पर मैंने भार दिया हुआ था, वह साफ नहीं थी। उसके पाहे थके हुआ थे। तरावट, लचीलापन और ताकत कहीं गुम थी। चर्र-चर्र की ध्वनि किसी को मीठी नहीं लग सकती। मैं आदि हूं।

कुर्सी हिल सकती थी। यह सच था कि वह कमजोर थी, लेकिन मेरा 60 किलो से कुछ कम वजन वह सह सकती थी। वह उस वृद्ध की भांति थी जो मेरे सामने बिस्तर पर बेसुध था। फर्क जीवित और मृत का था। इससे अंदाजा लग जाता है कि चीजें बोलती हुई कैसी लगती हैं। या यों कहें कि जिंदगी सांस लेती है।

काका के चेहरे पर भाव थे। पता नहीं क्यों मैं भरोसे के साथ नहीं कह सकता कि किस किस्म के, लेकिन था कुछ ऐसा जो उस वृद्ध के मस्तिष्क में मंडरा रहा था। सुध नहीं थी अपनी, चेहरे की लकीरें और माथे की सिलवटें बहुत कुछ बयान कर रही थीं।

आंखों की चुप्पी उस शांत सागर की तरह थी जो कभी शांत नहीं था। होठ किनारों से रुखापन समेटे हुए बाकी चमड़ी से मेल खा रहे थे। उनके बीच की दूरी जो मामूली थी, कायम थी। मैं सोच में पड़ गया कि इंसान जीवित है, और शांत है। फिर उठेगा और बोलेगा। अब वह वैसा नहीं जैसा पहले था।

उनकी उंगलियों को मैं देख ही रहा था कि उनमें मामूली हरकत हुई। मेरा ध्यान उनकी आंखों पर गया। नसें साफ चमक रही थीं जिन्होंने चमड़ी से संबंध बना रखा था। काका ने गर्दन को तिरछा किया। मैंने कुर्सी उनके करीब की।

बोले,‘तुम यहां...।’ एक मुस्कान उनके चेहरे पर तैर गयी।

जबाव में मैंने सिर हिलाया।

‘अब आप कैसा महसूस कर रहे हैं?’ मैंने पूछा।

उन्होंने कहा,‘मालूम नहीं। पर जिंदा हूं।’ हल्का हंसे।

अब मुझे मुस्कराना पड़ा।

मैं फिर सोच में पड़ गया कि बुढ़ापा कितना पुराना है, लेकिन वैसा ही है। बूढ़े काका से मेरी ढेरों बातें हुईं। यकीन करना मुश्किल था कि वे बीमार थे। ठहाके लगाये, जमकर हंसे। शायद उनके जैसे कुछ बूढ़ें हों हमारे आसपास। उनके आसपास मेरे जैसे भी हों जो उनसे बतिया सकें।

मैं दुनिया को अजीब मानता हूं क्योंकि उसमें कुछ लोग इतने पुराने हैं, फिर भी जिंदादिल हैं। हम यह क्यों कह देते हैं कि जिंदगी में हंसी-खुशी नहीं। अजी ढूंढिये तो सही मिल जायेगी। यहां न सही, क्या पता वहां हो कुछ ऐसा जो हमें खुशी दे सके। महसूस कीजिए कि जिंदगी शानदार है। ...क्योंकि जिंदगी में जितने दुख हैं, उससे कहीं अधिक खुशियां बिखरी हैं।

-Harminder Singh


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