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कैद परिन्दा

उड़ना है मुझे। मैं ऐसे नहीं रह सकता, बोझिल लगता है....
मुझे कभी-कभी खुद पर गुस्सा आता है कि मैं कई कामों से बोर हो जाता हूं। ऐसा पता नहीं मेरा साथ होता है या हर किसी की स्थिति यही है। समझ नहीं आता, हम इंसानों का मतलब क्या है। लगता है बिना मतलब के इधर-उधर तैरना हमारी नियति बन गयी है।

कई बार मैं खुद को उस परिन्दे की तरह समझने लगता हूं जिसके पंख कतरे जा रहे हैं और जो फड़फड़ा रहा है। यह अजीब माहौल बना रहा है। सामने विशाल पिंजरा, उसमें कैद मैं, बिना इतराये, एकदम बेचैन। घूरती आंखें, बिना मुस्कान के होठ। कभी-कभी सूखी हंसी जिसमें गरमाहट और नमीं बिना पेंशन के आ नहीं सकती या फिर एक कोरी बकवास।

उड़ना है मुझे। मैं ऐसे नहीं रह सकता, बोझिल लगता है। हां, मन को मारकर जीना पागलपन है शायद, पर मैं नहीं जानता। इस बेनूर से पिंजरे से मेरी जमानत करा दो। कोई तैयार नहीं। हर किसी के अपने पैंतरे हैं और उसूल। दिखावटों की फौज में घुलना पड़ रहा है। यह सपने की तरह भी है क्योंकि कांच के चटकने की आवाज आंख खुलते ही गायब हो जाती है।

सचमुच मैं आजाद होना चाहता हूं इस कालकोठरी से। दम घुटने लगा है मेरा। दिमाग अनगिनत ख्यालों से घिरा रहता है। होश में बेहोशी की दवा पी ली है। रास्ता सीधा था, अब तिरछी लकीरों से बातें हो रही हैं। समय ताला लगाकर कहीं भाग गया। तलाश बाकी है। परिन्दा फड़फड़ा रहा है। पुकार रहा है सभी दिशा। असहाय, गंभीर विचार ने उसके डैने जकड़ लिए हैं या किस्मत ने करवट ली है।

हाय परिन्दा!

हाय परिन्दा!

कैद परिन्दा!!

-Harminder Singh



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