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मक्खन, चटनी और रोटी


गांव में आज भी लोग चटनी से रोटी घी लगाकर बड़े चाव से खाते हैं। वास्तव में घर का घी या मक्खन और चटनी का स्वाद ऐसा होता है कि कोई भी दीवाना हो जाये। मेरी दादी जब मक्खन बनाती थीं तो हम सब टूट पड़ते। देखते ही देखते सारा मक्खन गायब हो जाता। उन्हें इससे बहुत खुशी मिलती। वे कहतीं -‘कल देखती हूं कैसे खाते हो? आज से ज्यादा दही बिलोया जायेगा।’

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घर के दूध का दही हांडी में जमाया जाता। उसके क्या कहने! मन वाह को करता है। फिर दही को मथकर या बिलोकर उसमें से छाछ और मक्खन को अलग किया जाता। यह प्रक्रिया देखने में थोड़ी उबाऊ लग सकती है, लेकिन मंथन के बाद अमृत ही निकलता है। बाजार वाला मक्खन उसके सामने किसी मोल का नहीं। 

अब वे दिन नहीं रहे, दादी नहीं रही न ही नानी। गांव में मक्खन खूब बनाया जाता है, लेकिन हम वहां पहुंच नहीं पाते। छाछ कभी-कभार किसी रिश्तेदार या गांव वाले के द्वारा पहुंच जाता है। उसे गुड़ के साथ पीने से एक अलग तरह का आनन्द अनुभव होता है।

रोटी मैं चटनी लगाकर पसंद करता हूं। घरेलू मक्खन नहीं होता, घी से काम चलाना पड़ता है। सप्ताह में एक-दो बार छाछ के साथ चटनी लगी रोटी खाता हूं। इन दिनों आम की चटनी भी बनायी जाती है। प्याज की चटनी, धनिया चटनी, पुदीने की चटनी, टमाटर की चटनी बनायी जा सकती है।

सप्ताह में सात दिन के मुताबिक प्रतिदिन अलग चटनी का सेवन किया जा सकता है। टमाटर की चटनी में गुड़ डालकर उसे और बेहतर तथा पौष्टिक बनाया जा सकता है।

-हरमिन्दर सिंह

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