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आदमी


आदमी की कीमत कितनी होती है। कीमती, बेशकीमती या कोई कीमत नहीं। आदमी बिकता है। खरीददार भी आदमी है। यह मेला है। यहां नित नई कहानियां रची जाती हैं। नये मोड़ किसी पल भी आ सकते हैं। जिंदगी सेकण्ड भर में बदल सकती है। रूठने-मनाने की अपनी कहानी है। दौर जैसा भी हो सवाल जिंदगी से किया जाता है। जिम्मेदारी जो भी ले, उत्तर तलाशने की कोशिश आदमी करता है। वह केन्द्र है, उसकी समझ उसे ऐसा बनाती है। उथलपुथल हर जगह है, लेकिन बंटवारा अक्सर सिमाओं में होता है।

आदमी के साथ आदमी जुड़ा है। बिना जुड़ाव कुछ मुमकिन नहीं। प्रेम और घृणा साथी हैं। एक के बिना दूसरे का वजूद नहीं। यह उसी तरह है जिस प्रकार अंधेरे बिना उजाले का मतलब नहीं और झूठ बिना सच नहीं।

जिंदगी आसमान में तैरते बादलों की तरह है। कभी बिखर जाती है, कभी जुड़ जाती है। बरसने को कभी बेताबी है, तो कभी बिना बूंदों की बनावट के गुजरना मुमकिन है। सांझ के पलों को समेटने की कोशिश में आदमी लगा हुआ है ताकि अगले दिन सूरज की किरणों से उसका वास्ता एक नये रुप में हो।

आदमी बिखर भी रहा है। अपनों की बेररुखी से, ओरों के कारण या खुद अपने बनाये नियमों की वजह से। वह जुड़ाव चाहता है। वह उम्र के ढलान पर पहले से अधिक समझदार हो गया भावनाओं को लेकर। रिश्तों की अहमियत को वह पहचान गया है। साथ ही वह सोच भी रहा है कि कहीं देर तो नहीं हो गयी?

हरमिन्दर सिंह

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2 comments:

  1. रिश्तों की अहमियत पहचान आये वक्त रहते तो बात क्या !

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    1. मगर वक्त रहते आदमी समझ जाये तभी वह आदमी कहलाता है...।

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