सच में कमाल के होते हैं रिश्ते

relationship
कुछ लोग हमारी जिंदगी में अपनापन हद से अधिक ले आते हैं। वे हमें अपना हिस्सा मानने लगते हैं। उनसे हमारा खून का रिश्ता नहीं होता लेकिन अपनों से किसी मायने में कम भी नहीं होते। सच में रिश्ते कमाल के होते हैं, और उनमें शामिल लोग भी..
 शाम के समय मुझे फिर से पैदल यात्रा करनी पड़ी। समय के मुताबिक घड़ी 7:30 बजा रही थी। मतलब 8:00 बजने में आधा घंटा। मतलब आठ बजे से पहले मैं भोजन ग्रहण नहीं कर सकता था। पिछले कई महीने से मैं आठ से पहले रात का खाना खा लेता था ताकि सोने तक वह पच जाये। 

सड़क को पार करने की सोच रहा था कि पीछे से किसी ने कंधे पर हाथ रखा। वह सुभाष था। उससे ढेर सारी बातें हुईं चलते-चलते। एक बैग उसने कंधे पर टांगा हुआ था। वह किसी रिश्तेदारी से लौटा था। 

पैदल चलते हुये और बातों में मशगूल लोगों को समय का पता नहीं चलता। हमारे साथ भी वैसा ही हुआ। फाटक के करीब पहुंचकर उसने चाय पीने की बात कही। मैंने पूछा कि उसने आजकल काफी पीना छोड़ दिया क्या। उसने "ना" में गर्दन हिलायी। फाटक पर चाय मिलती नहीं यह वह भी जानता है, मैं भी और सभी इलाके के लोग। उसके लिये हमें एक-दूसरे के घर जाना था या कैफे काफी डे। पहला आइडिया उम्दा था क्योंकि हम घर पहुंचने वाले थे। उसका घर पहले पड़ा। उसने मेरा हाथ कसके पकड़ा हुआ था। मैं चिल्ला नहीं सकता था यह उसे मालूम था और मैं स्वयं अंधेरे में ऐसा करने के पक्ष में बिल्कुल नहीं था। कोफी उसके घर बैठकर पी रहे थे कि खाने की फरमाइश भी उसने कर डाली। वह जिद्दी है मेरी तरह। मना किया नहीं जा सकता था। वैसे भी वह आजकल बदलता जा रहा है। उसे मुझपर ज्यादा प्यार आ रहा है। मुझे घर फोन कर बताना पड़ा कि सुभाष के घर हूं। स्वयं उसने मेरी मां से फोन पर भी कह दिया और पूरे परिवार को आमंत्रित कर लिया। वो अलग बात है कि मां ने उससे दिन में किसी अवसर पर आने के लिये बोल दिया। सुभाष ने मां से उसके लिये वादा भी ले लिया।

जब मैं घर पहुंचा रात के ग्यारह बज चुके थे। मुझे अब केवल सोना था। बिस्तर पर गिरते ही नींद आ गयी। 

सोचता हूं कि कुछ लोग हमारी जिंदगी में अपनापन हद से अधिक ले आते हैं। वे हमें अपना हिस्सा मानने लगते हैं। उनसे हमारा खून का रिश्ता नहीं होता लेकिन अपनों से किसी मायने में कम भी नहीं होते। सच में रिश्ते कमाल के होते हैं, और उनमें शामिल लोग भी।

-हरमिन्दर सिंह चाहल.

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