विचारों की आपसी रंजिश (Listen Podcast)

mutual fued among views

बूढ़ी काकी कहती है -‘एक हताशा मेरे अंदर घूम रही है। यह किस तरह का वेग है मालूम नहीं। क्या यह विचारों की आपसी लड़ाई है या उनकी आपसी रंजिश? विचार लड़ते हैं तो इंसान को स्वयं पर काबू करना कठिन हो जाता है। वह स्वयं से दो-दो हाथ करने की कोशिश करता है। यह उसके जीवन में कई तरह के विरोधाभास उत्पन्न करता है।’

’शून्य मन और भरा मन -दो अलग तरह की सोच रखते हैं। शून्य यानि कुछ नहीं, लेकिन विचारों की छाप वहां भी होती है। शून्य "है और नहीं भी" वाली स्थिति से गुजरता है। इसकी महत्ता समय के साथ प्रदर्शित होती है। न दिखने वाली वस्तु अचानक प्रकट होकर हमें उलझा देती है। वही स्थिति यहां उत्पन्न हो जाती है जो इंसानी समझ से परे हो सकती है। हमें समझना होगा कि बारीकियां  कितनी भारी हो सकती हैं और उनमें समाये हुए छींटे कितने मजबूत। यह एक तरह से रहस्य जानना हुआ। ऐसा रहस्य जिसे पहचान पाना जितना कठिन है, उससे कठिन उसे समझना है।’

इस पोस्ट को आडियो प्लेयर में नीचे क्लिक कर सुना भी जा सकता है...



’उसी तरह भरा मन शून्य मन के उलट हो सकता है। उसकी अपनी गणनायें होंगी और वह अपनी तरह से कार्य करता होगा। विचारों की सक्रियता जहां अधिक होगी वह भरा मन नहीं कहला सकता, बल्कि जहां विचारों की उलझी शिरायें अपने करतब दिखाती होंगी वह भरा मन हो सकता है। आपस में टकराव की स्थिति और उसपर उलझे हुए कोने, यह बहुत ही नाजुक स्थिति उत्पन्न कर देता है। विचारों की आपसी रंजिश मुस्कान को तौबा करने पर विवश करने की जुगत में भी प्रतीत होती है, लेकिन हमारी सोच उसे बदलने की काबलियत भी रखती है।’

’हताश मन ऐसा नहीं विचारों से खाली होता है। हलचल वहां भी होती है, परस्पर होती रहती है। फर्क इतना होता है विचारों की गरमी यहां अलग तरह से कार्य करती है। हमारे विचारों की समझ हमें हो सकती है या उन्हें जो उन्हें समझते हैं। यकीनन समझाया भी जा सकता है और वह समझ आये तो उन विचारों का महत्व और बढ़ जाता है।’

’मैं स्वयं से कहती हूं कि मैं खुद को विचारों में डूबा हुआ पा रही हूं। इसका मतलब यह नहीं कि मैंने स्वयं को विचारों की आंधी में घेर लिया है। ऐसा भी नहीं कि विचारों का संकट मेरे ऊपर आ गया है। यह सरल नहीं है। टेढ़ा भी नहीं है। सिर्फ इतना है कि विचारों की उलझी लटों को किस तरह सीधा किया जाये। किस तरह उन्हें अर्थहीन से अर्थयुक्त किया जाये। यह विचारों की आपसी लड़ाई से उपजी दुविधा है। हल है और हल आसान नहीं। उत्तर तलाशने की कोशिश जारी है क्योंकि सवाल उठा है, उत्तर मिलना चाहिए।’

सच में विचारों की आपसी रंजिश में उलझा इंसान स्वयं को असहाय महसूस कर रहा है।

-हरमिन्दर सिंह चाहल.
(फेसबुक और ट्विटर पर वृद्धग्राम से जुड़ें)
हमें मेल करें इस पते : gajrola@gmail.com

इन्हें भी पढ़ें :
आस्तिक और नास्तिक : जीवन कर्म पर निर्भर
जो पूछा जा सकता है, उसका उत्तर हो सकता है
टेंशन स्प्रिंग की तरह है
उम्र, बुढ़ापा और जिंदगी
कीचड़ भी निर्मल होगा
यादों की डोर


वृद्धग्राम की पोस्ट प्रतिदिन अपने इ.मेल में प्राप्त करें..
Enter your email address:


Delivered by FeedBurner

No comments