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खामोश बुढ़ापा



उड़ रही धूल,
परतें बन आयी हैं,
जिंदगी रही हांफ,
सरक-सरक कर शरीर भी,
करवट बदले वक्त की,
परछाईं चिपकी है,
मौसम की बहार में,
अधूरापन लिये,
देह कंपकंपा रही,
उंगलियां ठिठकतीं,
बुढ़ापा सूखा सही,
मंद झोंका तिरछापन लिये,
आड़ी-तिरछी रेखाओं के निशान,
मैं बह रहा नींद में,
लड़खड़ाई टागों के साथ,
फिर भी मुस्करा रहा,
बुढ़ापा कह रहा ढेर भरी बातें,
सुनने को पास नहीं कोई,
जो है मैं हूं,
मैं ही हूं,
आंख बंद किये,
सांस मंद किये,
सोना है मुझे,
हमेशा के लिये,
जाना है वापस न आने के लिये,
खामोशी चाहिये मुझे,
अब खामोश हूं मैं।

-हरमिन्दर सिंह चाहल.

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