बुढ़ापा मुस्करायेगा



मुस्कान वक्त ने कम कर दी,
तन्हाई घर कर गयी है,
इंतज़ार है लंबा,
सफर तय कर रहा मैं अकेला,
चलना ही है मुझे अकेला,
निशान बाकि न रह जाये,
पैरों से देखी रेत की शक्ल,
ठहरी जीवन की रेखायें,
मोल किसी का नहीं,
रूंधता गला मेरा कभी-कभी,
जब भी याद आती,
परछाईं फीकी है,
मगर मैं यकीन करता हूं,
जीवन बदलेगा,
जल्द बदलेगा,
पर ऐसा होगा,
क्या ऐसा होगा,
नहीं..नहीं,
ऐसा नहीं हो सकता,
उम्र का पारा गिर रहा,
थका-हारा मैं फिर भी,
भरोसा लिये हूं,
भरोसा साथ है मेरे,
हमेशा रहेगा,
बुढ़ापा मुस्करायेगा,
और शान से जियेगा।

-हरमिन्दर सिंह चाहल.

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