जिंदगी का सितार

ख्वाहिशों के दरवाज़े बंद हैं, खुलने का नाम नहीं लेते। यह जिंदगी अजीब है। कल कुछ, आज कुछ। शायद परछाइयां नये गीत गा रही हैं। हर गली-मोहल्ला आबाद है उन रूहों से जो मौसम को बदल रही हैं। यह जाने हुआ या अनजाने पता नहीं, लेकिन जिंदगी का सितार तो बज रहा है।

होश में आ रही हैं नदियां जिनके तल गहरे नहीं थे। उम्मीदों की चट्टानें मूगों से कह रही हैं कि जिंदगी के रेशे तैरते हुए अच्छे लगते हैं।

रोशनी का जाल बिखर कर फड़फड़ाहट को काबू कर रहा है। ख्वाहिशें मर नहीं रहीं, वे मचल रही हैं, गा रही हैं। हां, वे उन्मादी हो चली हैं।

बह रही जिंदगी, साये का क्या,
उम्मीद तो जिंदगी लगाती ही है।
तैरती नाव न डूब जाये कहीं,
सैर तो कराती है जिंदगी।

-हरमिन्दर सिंह चाहल.

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