गूंगी

खामोशियों के झुरमुट से निकलकर वह खिलखिलाना सीख रही है। उसने जीवन के रंगों को खोया है। जीवन की महीन तान को वह फिर सुनना चाहती है। वह चाहती है कि जिंदगी की सख्त परतें फिर से मखमली हो जायें। उनपर फिसलना सही मायनों में जीना होगा।

जानती है वह कि कुछ चीज़ें खोने के बाद वापस नहीं आतीं। आंखों में नमी लिये वह चुपचाप बैठी रही, फिर वह मुस्करायी। उसकी आंखों में चमक थी। गर्दन को तिरछा किया, हंसी, पलकों को बंद किया। मानो खो गयी हो किसी संसार में जहां चैन था, सुकून था, कोई दौड़ नहीं, भाग नहीं-बस वही थी, अकेली, चुपचाप।

उसकी उंगलियां बोलती हैं, वह नहीं। हां, गूंगी है वह।

-हरमिन्दर सिंह चाहल


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