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जीवन बीत गया बिना बताये

मैं ठहरा हुआ हूं। रुका हुआ पानी। कायी की परतों के बीच भी कुलांचे मारने की कोशिश है। सन गया है मेरा शरीर। बूंदों का गीलापन, शुष्कता की कोई गुंजाइश नहीं। फड़फड़ाहट का अंधापन और गंध का विकास तीव्र है। उम्मीद बाकी है। सांस मानो रुक-रुक कर चल रही है। मैं मरा नहीं। न मौत ने कोई करवट ली है।

सुन्न हो रहा हूं। सन्नाटा जैसे पसर गया है चारों ओर। एकदम शांति, पत्ते की खड़खड़ाहट सुनी जा सकती है। वह सूखा है, टूटकर गिरा है। टकराया है किनारे से, जमीन से कोसों दूर।

हूं मैं, अभी हूं। रहूंगा अभी रहूंगा। परिवार चुप है। क्यों है ऐसा मालूम नहीं। बेटी देख रही मुझे। पत्नि चारपाई के किनारे जाने कब से बैठी है। वह भी जर्जर है मेरी तरह।

टूटी-बिखरी देह लिये, कंबल में लिपटा मैं पागल की तरह अपनी पुतलियों से खेल रहा हूं। खेल तो रचा गया जाने कब का। जाने कब से रुह रुख्सती की आस लगाये है। हां, जाना होगा मुझे।

लेकिन आंसू हैं, प्रेम है, उसका क्या। दर्द है, इतना कि कहना मुमकिन। अपनों का दर्द। ओह! मेरी आंखें नम हैं। फफक रहा हूं।

बेचारी जिंदगी और बेचारा मैं। वह रही मेरे साथ। सुख में सुखी और दुख में दुखी। जिंदगी की जिल्द किताब से उतरने को बेताब है। कोई नहीं हंसेगा। रोयेगा हर कोई जो हृदय रखता है। रोयेगा हर वह जो मेरी तरह इंसान है। सचमुच जीवन का अंत भी होता है बल्कि जीवन का ही अंत होता है।

खेल बिना निष्कर्ष के संपन्न हुआ -न जीत, न हार। बड़ा ही अजीब है जीवन भी, बीत गया बिना बताये। आंसू हैं, पीड़ा है, लेकिन जीव नहीं।

मैं हूं नहीं, शब्द जुड़ रहे, उजड़ रहे। कल की ही बात थी। कैसी थी काया, कैसा था मैं। अब न मैं, न मेरा वजूद। यादें हैं, सिर्फ यादें जिन्हें वक्त धुंधला कर देगा।

सच है -

न था मैं कभी,
न हो सकता कभी।
न कुछ लिया,
न दिया कभी।
जो था नहीं कभी,
वह पाया नहीं कभी।
जीवन था,
मैं था क्या कभी?


-हरमिन्दर सिंह चाहल.

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