बुढ़ापा हूं मैं

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हूं मैं कमजोर,
लेकिन मजबूती से खड़ा हूं,
ढहने की चाह नहीं,
पर भरभराकर भी गिरा हूं,
मैं हताशा को अचरज से देखता आया हूं,
जिंदगी की मुसीबतों से लड़ता आया हूं,
रहा नहीं मैं कभी खुद से खफा,
हर दर्द की दवा देता आया हूं,
देखा है जमाना, उसके रुप भी,
यादों को संजोता आया हूं,
मैं हूं बुढ़ापा,

पुरानी चादरों के धागों से बना,
गांव की पगडंडियों से गुजरता आया हूं,
कांपती देह को महसूस किया,
अपनों के लिए जिया,
लेकिन अपनों का सताया हूं,
हां, मैं बुढ़ापा हूं,

मैं अड़ा हूं वक्त से,
लड़ा हूं खुद से,
नहीं वक्त साथ मेरे,
फिर भी उनके लिए जिया हूं,
जीत-हार का प्रपंच देखता आया हूं,
खामोशी से इंतजार किया है,
जीवन भरपूर जिया है,
थमूंगा नहीं,
हौंसला गजब का पा लिया है,
विदाई तय है,
सवाल हूं खुद,
ढेरों छोड़ा जाऊंगा,
बुढ़ापा हूं मैं,
नहीं पता क्या जीवन से पाऊंगा।

-हरमिन्दर सिंह चाहल.

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6 comments:

  1. kamaal ke shabd....bahut badhiya post

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  2. जीवन जिया हो जिसने वो सिर्फ जिस्म से बूढा हो सकता है बस ..
    अच्छी रचना है ...

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    1. बिल्कुल सही कहा आपने दिगम्बर जी...
      बुढ़ापा होता ही ऐसा है.

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