खुला खत : दिन कैसे कटता है आजकल?

प्रिय तनु,

यादों को बहुत संजोने की कोशिश की है। समझ नहीं आता उन्हें कहां रखूं। ऐसी कोई संदूक नहीं जहां वे बंद की जा सकें।

ऐसा मुझे क्यों कहना पड़ रहा है, मैं नहीं जानता। जानता हूं बस कि जो मन में है, कह रहा हूं। ओर या छोर की बात मैं नहीं करना चाहता क्योंकि जिंदगी बदल-बदल कर चलती है। जिंदगी छोरों में कहां बंधती है? वह तो हवा की तरह उड़े जा रही है।

मेरी मर्जी जो है, मैं जो चाहता हूं, करना चाहता हूं। पर हर बार ऐसा नहीं हो पाता। पुराने दिन, वही पुराने दिन जो मैं भूले बैठा हूं। और जो आज, अभी चल रहा है, उसे समेटने की कोशिश ने मेरी बेचैनी बढ़ा दी है।

कल मैंने अपनी लाठी को देखा। बहुत देर तक मैं उसे देखता रहा। वह खामोश रही, एक शब्द भी नहीं बोली। वह कई साल से मेरा सहारा है। मैं चलता हूं, उसे पकड़ता हूं। उसके सहारे से मैं बैठता हूं। वह सहयोगी है मेरी। लगता है उसका और मेरा साथ लंबा चलने वाला है। पर डर भी है मन में, कहीं यह साथ जल्द छूट न जाये।

खैर, मैंने अपनी छोटी कहानी बता दी, तुम्हारा हाल तो पूछा नहीं।

कैसी हो तुम? दिन कैसे कटता है आजकल?

बच्चों के बच्चे तंग करते हैं या दादी-दादी कहकर चिढ़ाते हैं।

तुम्हारा पिछला खत मुझे श्याम ने पढ़कर सुनाया था। बुरा मत मानना है, मैंने ही उसे ऐसा करने को कहा था। तुम तो उसे अच्छी तरह जानती हो न।

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दवाई खाने से सेहत बिगड़ती है मेरी, सो छोड़ दी। एक-दो दिन परेशान रहा, अब रोज रात में पढ़ता हूं। उपन्यासों का ढेर लगता जा रहा है।

श्याम कह रहा था उस दिन,‘बाबा आप किताबों से बचते थे, अब किताबें आपसे बचकर नहीं जाने वालीं।’

तुम कह रही होगी कि मैंने खत की शुरुआत बहुत गंभीर की और आखिर में अपने पुराने अंदाज में लौट आया।

क्या करुं तनु, तुमसे ज्यादा कौन मुझे जान सकता है।

उम्र बीत जाने के बाद भी, सालों अलग रहने के बाद भी हम ऐसे ही जिंदा हैं। ऐसे ही हम बूढ़े आस लगाये हैं कि कुछ अच्छा होगा।

और हां, अच्छा हो रहा है।

जरुर तुम हंस रही होगी मेरी बुढ़ाई पर, जिंदादिल बातों पर।

पता है तुम बोर हो रही होगी। खत्म करता हूं यहीं इन बेतुकी बातों को।

तुम्हारे खत का इंतजार रहेगा।

तुम्हारा

मनोज.

-हरमिन्दर सिंह चाहल.

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