बूढ़ी काकी : उम्र और स्वयं से पूछ गये सवाल

काकी का जीवन धीमा बह रहा है, लेकिन वह जीवन की सुन्दरता को मन से नहीं जाने दे रही.

‘हमें क्या बनना है? हमारी आकांक्षायें क्या हैं? क्या हम महान बन सकते हैं? हमेरे जीवन का लक्ष्य क्या है? ऐसे तमाम विचार हमारे मन में आते हैं। उन सवालों का उत्तर तलाशने की हम कोशिश भी करते हैं। उत्तर मिले न मिले, लेकिन मन का एक कोना अक्सर हमें उकसाता रहता है। हम उकसावे में आ भी जाते हैं, फिर चल पड़ते हैं उत्तर की तलाश में। क्या कभी हमने सोचा है कि जो सवाल हम स्वयं से कर रहे हैं उनका उत्तर खोजने की जरुरत है या नहीं।’ बूढ़ी काकी बोली।

मैं कुछ याद करने लगा। बीच-बीच में मैं काकी का झुर्रीदार चेहरा भी देख लेता। मेरे मुताबिक सवाल और जवाब बहुत ही पेचीदा हैं, लेकिन हल निकलना चाहिए। कभी-कभी हम स्वयं को इतना उलझा हुआ महसूस करते हैं कि जीवन की भूल-भुलैया में असहाय हो जाते हैं। तब शायद स्वयं से पूछे गये सवाल काम आते हैं।

बूढ़ी काकी

काकी ने आगे कहा,‘दशकों पूर्व जब मैं तुम्हारी उम्र की थी, मुझे किसी ने सफर के दौरान बहुत देर तक समझाया था कि मैं अपना लक्ष्य चुन लूं। वे एक बुजर्ग थे जिन्होंने स्वयं को 82 साल का बताया था। वे बहुत सहज दिखायी दिये लेकिन मुझे ऐसा लगा कि मैं असहज हो गयी थी। मुझसे पहला सवाल किया गया कि मैं क्या करना चाहती हूं। मैं उनकी तरफ देखती रही। वे हैरान हो गये। असल में तब मुझे कोई लक्ष्य समझ नहीं आया। ऐसा हमारे साथ आमतौर पर होता है।’

‘मैं कुछ भी कह सकती थी और वे उसे मान भी लेते, लेकिन मैंने वह उचित नहीं समझा। हर किसी का जीवन में कोई न कोई लक्ष्य होता है। जबकि मेरे मुताबिक मेरा लक्ष्य कुछ था नहीं। असल में जबतक हमें यही मालूम नहीं कि हमारा ध्येय क्या है, हम चाहते क्या हैं, हम उलझन में रहते हैं। उम्र के कच्चे पड़ावों में हम जल्दबाजी और भागने में व्यस्त रहते हैं। हर कदम दौड़ कर पूरा करने की कामना होती है। यही कारण है कि इंसान की जवानी कच्ची फसल है। पकने में समय तो लगता ही है। जो लोग परिपक्वता और विश्वास के साथ हर कदम रखते हैं, उन्हें भविष्य के मीठे फल आसानी से मिलने की उम्मीद अधिक है। सपने वे भी देखते हैं, लेकिन पूरे करने की मजबूत चाह के साथ।’

‘बाद में उन बुजुर्ग ने मुझसे कई सवाल किये। ऐसा लगा कि उन्हें कुछ उत्तर समझ आये, कुछ नहीं। बाद में वे बोले कि युवावस्था में वे अपना लक्ष्य स्थापित नहीं कर पा रहे थे। वे मेरी तरह सोच में डूब जाते थे। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती गयी, जिम्मेदारियां बढ़ती गयीं, उन्हें मालूम हुआ कि वे अकेले आगे नहीं बढ़ रहे। तब उन्हें लगा कि वे स्वयं को केन्द्रित करें। उन्होंने आत्मचिंतन किया और वे सफल हुए।’

मैं सोच में पड़ गया कि उम्र के साथ हर किसी का जीवन बदलता है। काकी बड़े चाव से मुझे जीवन के पुराने अनुभव बता रही है। वह जानती है कि ऐसा वह इसलिए कर रही है ताकि मेरी जिंदगी प्रभावित हो। वह ऐसा इसलिए भी कर रही है क्योंकि वह जानती है कि उसके द्वारा जीवन की सीख मेरे लिए महत्व रखेगी और उन कहानियों को लिखने में मेरी मदद करेगी जिनसे जीवन चलता है। ये कहानियां विचारों की होंगी, ये कहानियां व्यवहार की होंगी। साथ ही इन कहानियों में जीवन का सच होगा जिसके पात्र वे सब होंगे जो मेरे आसपास हैं।

जानता हूं मैं कि कहानियां हर बार खुशहाल नहीं होतीं। वे रंग-बिरंगी भी हैं। इतनी खुशबूदार कि उनकी महक जीवन पर असर डालती है। वे नीरस भी हैं। इतनी नीरस कि जिंदगी बोझ से भर जाती है। मगर एक बात तय है कि कहानियां जीवन को बदलती हैं।

बूढ़ी काकी ने कहा,‘मैं खुद से सवाल पूछती हूं। मैंने भी सवालों का एक ढेर इकट्ठा किया है जो समय-समय पर मेरे सामने आता है। उत्तर खोजने की मेरी हैसीयत हो न हो, मैं कोशिश जरुर करती हूं। ऐसा करने से मुझे खुद पर भरोसा करना आ गया। यह विश्वास जीवन के अनगिनत पड़ावों को पार करने में मेरी मदद करेगा।’

‘सच्चे अर्थों में हमारी सोच हमारा विकास करती है। हम चाहते हैं कि ऐसा हो, वैसा हो, और अंत में चुनाव हमें ही करना है। जीवन की कई कड़ियां बेशक कमजोर दिखें, लेकिन उनमें उत्साह भरने का काम इंसान स्वयं करता है। उसके सामने ऐसा करने के कई रास्ते हैं। चयन करना उसपर निर्भर है। उसका मस्तिष्क उसे मन से लड़ाई के लिए भी तैयार कर सकता है। कभी-कभी द्वंद खेल को बिगाड़ सकता है। यह इंसान की समझ पर है कि वह विचारों से लड़े या उनसे जुड़े। वह उनकी छंटनी भी करता है- ये काम के, ये बेकार। कुछ ऐसे भी हैं जो इंतजार वाली सूची में डाल दिये जाते हैं क्योंकि उनकी अभी जरुरत नहीं।’

‘बुढ़ापा हमें परिपक्व बनाता है। यह उम्र का ऐसा पड़ाव है जो इंसान को विवश करता है सोचने को। हम जीभर सोचते हैं। हम जीवन के हर पहलू को खोल कर रखने की जुगत में रहते हैं। कहानियां यहां रोचक होती हैं। लेकिन उम्रदराज होने पर एक असहजता उस रोचकता को सिमटने पर मजबूर करती रहती है। वह काफी हद तक सफल हो जाती है। जिंदादिली से जीने वाले बूढ़े नीरसता में भी जीवन का आनंद खोज लेते हैं। मगर ऐसे लोग कम हैं। यह देखने में आसान लग सकता है। यदि हम गहनता से इसपर मंथन करें तो चीजें उतनी सरल नहीं। मैं कई बार सोचती हूं कि सरल होते हुए भी कुछ सरल नहीं। हमारा नजरिया ऐसा होना चाहिए या हम ऐसे विचार मन में हर समय बनाये रखें कि सबकुछ सरल लगे। यदि ऐसा होता तो बुढ़ापा सबसे सरल होता। हर कोई उम्रदराज होने की कामना करता।’

बूढ़ी काकी जिंदगी के पड़ावों को पार कर रही है। वह खामोशी से बदलावों को महसूस कर रही है। उसने जीवन के रंगों को जिया है। वह उनमें घुलमिल गयी है। हालांकि काकी का जीवन धीमा बह रहा है, लेकिन वह जीवन की सुन्दरता को मन से नहीं जाने दे रही। यही उसकी खासियत है। काकी उम्रदराजी में होते हुए भी जीवन की बची मिठास को भरोसे के साथ चख रही है।

-हरमिंदर सिंह.

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