एक कैदी की डायरी -9



थक सा गया हूं, बिल्कुल. अंधेरा मुझे घेरने की कोशिश कर रहा है। पता नहीं कहीं से कोई किरण उजाला ला देती है। मगर वह कुछ समय का होता है। हां, कुछ समय की छटपटाहट कम हो जाती है। कम होता है दर्द, कराहट और उलझनें। करवटें बदलकर रात भर जागने की आदत हो चुकी। खुद में सिमट कर रह गया हूं। पहले नींद कहती थी,‘मैं तुम्हारे पास आना नहीं चाहती। तुम पापी हो, हत्यारे हो। किसी के खून से तुमने हाथ लाल किये हैं। किसी को दर्द दिया है तुमने। तुम कैसे चैन में रह सकते हो? तुम्हें माफ नहीं किया जाना चाहिए। मैं ऐसा हरगिज नहीं कर सकती। मैं ऐसा करना भी नहीं चाहती क्योंकि तुम्हारा व्यक्तित्व मैं पहचान चुकी हूं। तुम स्वयं को भगवान समझते हो। किसी की जान लेकर तुम बहुत खुश हुए। तुम सोच रहे होगे कि तुमने पुण्य का काम किया। नहीं, नहीं, बिल्कुल नहीं। संसार को ऐसे लोगों से घृणा करनी चाहिए। मैं करती हूं। मैं ऐसे बुरे इंसानों से दूर रहना बेहतर समझती हूं। पापी कहीं के।........अब बैठो तन के और अपनी बहादुरी का परिचय दो। किसी की चीखों को तुमने कैसे अनसुना कर दिया? उसकी पत्नि अपने पति को बचाने की जद्दोजहद कर रही थी और तुम..........। ..............और तुम उसे अंधों की तरह चाकू मार रहे थे। उसका खून टिप-टिप कर गिर रहा था और तुम्हारा खून उबाल ले रहा था। वह तड़प रहा था, तुम मन ही मन प्रसन्न हो रहे थे। रक्त के छींटे जमीन को लाल कर रहे थे। तुम्हारा चेहरा आवेश में सुर्ख था। एक जिंदगी धीरे-धीरे मर रही थी। तुम उसे हाथ-पांव मारता देख रहे थे। तब तुम्हें दर्द नहीं हुआ। उसकी पत्नि उससे लिपट कर तुम्हें कोस रही थी। जानते हो एक सुहागिन की टीस कितनी पैनी होती है। हीरे की परत तक को छलनी कर देती है। उस स्त्री की चूड़ियां टूट कर बिखरी थीं। यहीं से उसके अरमान भी बिखर गये। उसका सिंदूर पोंछ दिया गया। कभी गहनों से लदी वह, कोरी मूरत लगती थी जिसके रंग छिन गये हों। दुखी थी वह, खूब रोयी थी वह। उसकी तो दुनिया तुमने एक क्षण में लूट ली थी। वह निर्जन वन का सूख पेड़ हो चुकी थी। उसकी हाय से क्या तुम बच सकते हो? नारी का प्रेम जानते हो, घृणा नहीं। वह जितनी नम्र है, उतनी कठोर भी। तुम उसकी पीड़ा को अब जान रहे हो या नहीं, लेकिन करनी को भुगतना पड़ता है। तुम इंसान होते ही ऐसे हो। संवेदनाओं की बात करते हो, दूसरों का दर्द तुम्हारे लिए बेमतलब का है। अपनी पत्नि का दुख जानोगे तो पता लगेगा। मोह का अर्थ कितना गहरा है, तुम क्या जानो? जब अपने बिछुड़ते हैं तब आंसुओं की कतार लंबी होती है। लंबा होता है वक्त क्योंकि तब कोई अपना हमसे रुठकर चला गया होता है।’

‘बहुत पीड़ा होगी तुम्हें। शायद बहुत पछतावा भी। तुम पापी हो। पाप तो हो चुका। ईश्वर पर दोष देने से कोई लाभ होने वाला नहीं क्योंकि उसे धोखा दिया नहीं जा सकता। सभी इंसान स्वार्थी हैं, तुम भी। आवेश तन कर खड़ा हो गया तो उसके हो लिए। कैसी मानसिकता है तुम्हारी? मुझे तुम पर दया नहीं आयेगी। भला हत्यारे पर दया किस मोल की? तुम जैसे इंसान दूसरों की रोशनी छीनकर उन्हें अंधेरे में रहने को मजबूर करते हो। अंधेरा काला होता है। सबको भय लगता है जब जीवन का एक किनारा सिकुड़ जाए। तुम्हें दब कर जीना होगा, घुट कर जीना होगा। यह इंसाफ ही तो होगा। फल भुगतने की बारी सबकी आती है- कुछ देर से, कुछ जल्दी हलाल होते हैं। तुम्हारी तड़पन देखने लायक होगी। समझ चुके हो शायद अपने वक्त की कहानी का अंजाम। घिसट-घिसट कर जीवन चलेगा। इसकी रगड़ तुम्हें अंदर तक छील देगी और दर्द इतना अधिक होगा कि रो भी न सकोगे। पीड़ा का अहसास खुद करने पर वास्तविकता का पता चलता है। पीड़ा को करीब से देखे स्वत: ही कराह उठोगे। भीतर छिपे शैतान को अपना दर्द दूर करने के लिए अब पुकारो। क्यों, असहाय हो गए न। लोग अक्सर भूल कर जाते हैं कि उनका किया सब सही है। तुमने यही किया- भगवान खुद को मान बैठे। एक स्त्री को विधवा बनाया। उसके बच्चों से उनका प्यारा पिता छीन लिया और पत्नि से उसका पति। क्या मिला, आखिर हासिल क्या हुआ? ओरों को भी तड़पाया स्वयं भी कष्टों को समेटा। यह भुगतना पड़ेगा। अपने जब दूर हो जाते हैं तब कष्ट इतना भारी होता है कि दुख समेटे नहीं सिमटता। इसे दुखों के पहाड़ से बड़ा कहते हैं। जिंदगी छीनना आसान है, उसे निभाना कठिन। तुमने खुद को ऐसे हालातों का मोहताज बना दिया कि अब सिवाय दुखों के कुछ नहीं। जियोगे, जरुर जियोगे, तुम्हें जीना पड़ेगा। भला तुम्हारे जैसा इंसान इतनी आसानी से मर कैसे सकता है? देखोगे वह जो पहले नहीं देखा, सहोगे वह जो नहीं सहा। हर जगह गमों का जाला होगा जो जकड़ कर रखेगा तुम्हें। उजाला ढूंढते फिरोगे, हाथ नहीं आयेगा। सवेरे की तलाश अधूरी रहेगी। उजड़े दिनों की शुरुआत हो चुकी। तैयार रहो, काले बादल कब आ जायें। यह होना ही चाहिए। बुराई का नाश किसी भी कीमत पर होना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होगा तो बुराई सिर उठायेगी, चटकारा लेकर अच्छाई का उपहास करेगी। बुरों को उनके किए के परिणामों को तुरंत दिया जाये जिससे ऐसे दुष्टों का संहार हो सके। जीवन को तुम्हारे जैसे लोग खराब बना देते हैं। केवल आवेश को हल समझते हैं। तड़पो और तड़पो। जियो, अब पता लग जाएगा कि किसी को मारकर कैसे जिया जाता है। सच से कब तक भागते रहोगे। दौड़ कितनी भी लंबी क्यों न हो वह अंजाम तक जरुर पहुंचती है। तुम दौड़े हो, बहुत चले हो। अब पिंजरे में हो। जैसे एक पंछी कभी जिसकी उन्मुक्तता उसे कुछ भी करने की इजाजत देती थी, आज उसके दिन बदल गये हैं। वह दया का पात्र बनकर रह गया है। कोठरी में बंद एक निर्जीव सी वस्तु जिसकी चीखें अभी उतनी नहीं, आगे और बढ़ेंगी। पंखों की फड़फड़ाहट किसी काम की नहीं।’

‘आज वक्त ने तुम्हें भिखारी सा बना दिया है। कुछ क्या, कुछ भी तो नहीं है तुम्हारे पास। कटोर फैलाते हो कोई भीख तक नहीं देता। भिखारी, बेसहारा, मोहताज कहीं के। सूखी टहनियांे को अपना दुखड़ा रो सकते हो। वे हरी थीं, तभी सुनती थीं। जमाना तुमसे बचने की कोशिश कर रहा है। एक हत्यारे से मेल कौन करना चाहेगा? कौन दो शब्द कहना चाहेगा? कौन यह चाहेगा कि इसे हम कभी जानते थे? कौन तुमसे बात करेगा? कोई नहीं। शांत, मृत दीवारों से मित्रता नहीं की जाती। क्या करोगे? दीवारों से सिर पटक कर कुछ हासिल नहीं होगा। माथे को लहूलुहान करके देखो, पीड़ा कितनी होगी। खून का एक कतरा बहने पर कष्ट कितना होता है यह जानोगे। हृदय की हालत क्या होती है, यह भी जानोगे। पर तुम क्यों जानोगे, तुम्हें दूसरे का दर्द मालूम ही नहीं। मुझे घृणा है तुमसे, तुम्हारे इरादों से।’

लेकिन नींद अब उतना दिक्कत नहीं करती। उसे वास्तविकता का मैं अहसास करा चुका। लेकिन उसे अभी भी संशय है। शायद जिसका हल न उसके पास है, न मेरे।

contd...

-harminder singh

2 comments:

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  2. लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

    जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

    मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

    भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

    अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

    थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

    http://umraquaidi.blogspot.com/

    उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
    “उम्र कैदी”

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