अधूरी कहानी




टूटी छत के नीचे बैठा सरधना कुछ बुदबुदा रहा था। जिस चारपाई पर वह था उसकी हालत भी उसी की तरह खस्ता थी। एकदम घिसी हुई सभी वस्तुएं एक परंपरा का बोध कराती थीं जिसके तहत कल्पनाशील चित्रकार कल्पना छोड़कर ऐसा दृश्य उकेरे जो वास्तविक लगे। सरधना की व्याख्या करने के लिये चारपाई के नजदीक लाठी मानों कुछ कह रही थी। शायद यही कि उसका और उसके मालिक का साथ पुराना है, सदियों का पुराना। लेकिन वक्त के दरवाजों की ध्वनि कर्कश हो चुकी है। कपाट कभी भी बन्द हो सकते हैं। सदा के लिये। समय के अन्तिम पड़ाव की और बढते कदमों को भला कौन रोक सकता है। खुद समय भी नहीं।

सरधना की बीमारी हर किसी की बीमारी है। जीवन की यह सच्चाई है। वह चुप है। बोले तो किससे। आसपास सब का सब निर्जन, शान्त, मूर्त रूप में। उस कोठरी में बरसों रहना पहले खलता था। अब आदत बन चुका है। परिवार से अलग एकान्त में रहता सरधना कुछ करने काबिल नहीं। उसके मुख पर मुस्कराहट की हल्की परछाई पड़ती है। फिर यकायक वह लाठी की तरफ हाथ बढाता है। पूरी उर्जा व्यय कर उठने की कोशिश करता है। वह बाहर की तेज धूप से बचने के लिये सिर पर पुराना गन्दा पर भद्दा सा कपड़ा ढक लेता है। पैरो में चप्पलें टूटी हालत में हैं। फिर चारपाई के नीचे रखा वह कटोरा उसके दूसरे हाथ में होता है। कुछ समय बाद सरधना सड़क के किनारे एक पेड़ के नीचे होता है। उसने सिर के कपड़े को उतार कर जमीन पर बिछा दिया और जिस पर वह बैठ गया। घण्टों बीत गये सरधना ऐसी ही मुद्रा में था मगर चुपचाप, धीरज बंधाए।

-by harminder singh

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