खोई यादों को वापिस लाने की चाह




लाठी जर्जरता को ओढ़े है मेरी तरह। न वह थकी है, न मैं। हमारा साथ समय के साथ पुराना होता जा रहा है। वह भी चुप है, मैं भी।

हमारी किस्मत शायद एक-जैसी लगती है। मैं नहीं जानता कि कितना वक्त बचा है। हां, इतना मालूम है कि वक्त कम है।

खोई यादों को वापिस लाने की चाह है मेरी। उन्हें सीने से लगाने की ख्वाहिश है क्योंकि एक बार ही सही, मैं उन पलों को जीना चाहता हूं। मैं उन शब्दों की रो में बहना चाहता हूं जो नाजुक थे, प्रभावपूर्ण थे, चंचल थे, हृदय पर छपते थे।

नहीं चाहता कड़वी यादों को दोहराना। कड़वापन मीठा नहीं हो सकता। मिठास की वास्तविक परिभाषा मैं नहीं जानता। अंधकार में लौटने की ख्वाहिश किसी की नहीं होती। उजाला सबको अच्छा लगता है।

-harminder singh

2 comments:

  1. वृद्ध कौन नही होगा?युवावस्था में हम इस सच को भूल जाते हैं.
    कयों ये उम्र एक टीस लेके आती है? महानगरों से निकल कर अब ये समस्या छोटे शहरों और गांवों तक जा चुकी हैं.सर्वे के दौरान मैंने खुद देखा.महसूस किया बहुत दुःख हुआ.मेरे ब्लॉग 'उद्धवजी' में एक आर्टिकल है 'उसकी माँ' वो और कोई नही मेरे अपने परिवार की कहानी है.क्या कहें?

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