एक कैदी की डायरी- 24

jail diaryआज जब मैं उस वक्त को याद करता हूं तो अजीब हो जाता हूं। क्या स्त्री का मोह इतना तेज होता है कि पुरुष उसमें बंध जाता है? लेकिन मेरी मां तो पिताजी के जीवन में आयी पहली स्त्री थी। शीला तो बाद में आयी थी और वह व्यवहार में एक स्त्री बिल्कुल नहीं लगती थी। घृणा होती थी मुझे उससे।

हमारी मनोस्थिति पर हर उस बात का गहरा प्रभाव पड़ता है जिसका संबंध हमारे जीवन से होता है। खासकर नन्हीं उम्र में बहुत से प्रभावों से हमें गुजरना होता है। तमाम जिंदगी उनकी छाप रहती है, कंबल ओढ़े या बिना कपड़ों के। संबंधों की बारीकियों को इंसान जीवन भर समझता रहता है। पर सवालों की उलझनों को सुलझाना आसान नहीं।

स्त्री छवि मस्तिष्क में आने पर उसके चरित्र का भी ज्ञान हो जाता है। वह कोमल होगी, करुणा को पुरुष से अधिक जानती होगी। दया, ममता आदि भावों का मिलाजुला रुप होगी। उसमें समर्पण की भावना कूट-कूट कर भरी होगी। प्रेम का स्थायी वास होगा जिसकी झलक उसके व्यवहार में मिल जायेगी। मगर शीला में इन सबका अभाव था। उसके कठोर शब्दों के बाण सीधे हृदय पर चोट करते थे। घायल होकर भी मन घायल नहीं लगता था। किसी व्यक्ति के शब्द इतने कठोर होते हैं कि वे चुभते बड़ी आसानी से हैं। उनका पैनापन कमाल का होता है, मगर दूसरा व्यक्ति बेहाल हो जाता है। मन की फड़फड़ाहट भीतर ही भीतर एक तरह की कमजोरी उत्पन्न करती है जो पीड़ा देती है और कई बार हताश होने को विवश कर देती है। मैं नादान था लेकिन इतना नहीं कि दादी की परेशानी न समझ सकूं। शीला चाहती थी कि पूरे घर पर वह ही काबिज हो जाए, एक पति उसे मिल ही गया था।

to be contd...

-Harminder Singh

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