कीचड़ भी निर्मल होगा

दिमाग में कीचड़ भी हो सकता है। किसी का दिमाग सड़ भी सकता है। कहने को कुछ भी हो सकता है क्योंकि इंसान कुछ भी कर सकता है। ऐसे लोग जो बातों का पहाड़ तोड़ सकते हैं। दूसरों के सामने स्वयं को बड़ा सिद्ध साबित कर सकते हैं। किसी के लिये मन में अच्छा विचार नहीं पाल सकते। कोसते हैं दूसरों को। उनकी तरक्की बर्दाश्त नहीं कर सकते। ऐसे लोगों के दिमाग में कीचड़ नहीं भरा तो और क्या भरा है। दिल, दिमाग, मन तक मैला कर चुके ऐसे लोग। उन्हें संसार में बिना मतलब के हिस्सेदारी दी हुई है। 

बूढ़ी काकी कहती है,"जीवित वे भी हैं। जीवन पर जितना अधिकार तुम्हारा है, उनका भी है। संसार उनका भी घर है। फर्क यह है कि उन्हें जीना नहीं आता। लोगों के साथ रहना उन्हें आता नहीं। यही विडंबना है।"

"कुछ लोग दूसरों की खुशियों से खुश नहीं। यह उनकी आदत में शुमार है। पहले वे ऐसे नहीं होंगे। बदलावों को जन्म देने वाला वक्त है। समय के साथ हम बदलते हैं, और हमारे विचार भी। नहीं बदलता केवल इंसान, फर्क उसके विचार में आता है।"

"कीचड़ में कमल खिलता है। लेकिन कीचड़ कमल की बराबरी नहीं कर सकता, जबकि एक के कारण दूसरे का जीवन चलता है। शायद संसार की रोचकता बनी रहे, इसलिये बुरे विचार, बुरे व्यवहार को साथ चलना पड़ता है। इसमें बदलाव किया जा सकता है। इंसान के कारण यह उपजा है। निवारण भी उसे खोजना है। धैर्य चाहिये पत्थर से सुन्दर कलाकृति बनाने के लिये। यह भी जीवन की एक परीक्षा होगी।"

काकी ने आगे कहा,"कीचड़ से सना दिमाग अच्छे दिन की आस जरूर मनायेगा। कीचड़ भी निर्मल हो जायेगा। वह भी खुद को समझेगा ताकि उसका भला हो सके। जीवन है तो संभलना जायज है। देर से सही लेकिन बदलाव दिन ढलने से पहले आ जाये तो बेहतर होगा।"

मैं सोचने लगा कि जिंदगी छोटी है, लेकिन नामुमकिन नहीं। यह जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

-हरमिन्दर सिंह.

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