खेत में तपते बुजुर्ग

बुढ़ापा मायूस है, एक ओर पड़ा है। जानते हैं हम तपेगा आखिरी सांस तक। वह भुगत रहा है जिंदगी को लेकिन यह बुढ़ापे की नियति बन रहा है कि वह तड़पे क्योंकि अपने ऐसा ही चाहते हैं..
लगता है अभी जान बाकी है। वे खेतों में काम में व्यस्त हैं। चिलचिलाती धूप और टपकता पसीना उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। उन्हें खेत की नलाई करनी है, पानी लगाना है और जानवरों के हरे-चारे को काटना भी है। यदि वे ऐसा नहीं करेंगे तो शाम का खाना उन्हें नहीं नसीब होगा। दोपहर को भी नाम मात्र का भोजन उन्हें मिल पाता है। नमक की रोटी चटनी के साथ। कभी गुड़ की डली या मट्ठा जिसमें पानी की मात्रा अधिक होती है, दिया जाता है। विरोध दर्ज करने पर शारीरिक एवं मानसिक रूप से प्रताड़ना भी झेलनी पड़ती है। ये कोई गुलाम नहीं। किसी पराये मुल्क के बाशिंदे नहीं। न इन्होंने कोई ऐसा पाप किया जिसकी सजा इन्हें दी जा रही है। इनके साथ ऐसा बर्ताव इनके खुद के बहू-बेटे कर रहे हैं। 

आराम करने की उम्र में सुबह से शाम तक कमर मोड़े ये लोग खेत को हरा-भरा करने में जुटे हैं। पुरूष बुजुर्गों की संख्या ज्यादा है जबकि महिलायें भी इसी तरह जूझ रही हैं। 

मैं कई गांवों में गया। मैंने बुजुर्गों से बात की। वे असहज दिखे लेकिन बाद में अपनी आप-बीती बताने से खुद को रोक न सके। यह दर्द था जो अपनों ने दिया था। अपनों के लिये उन्होंने कितना पसीना बहाया। दिन-रात एक कर उनके लिये जी जान अड़ा दी ताकि उन्हें कोई परेशानी न आये। दुख इस बात का है कि तमाम जिंदगी खेतों में निकल गयी। आखिरी वक्त भी यहीं कट रहा है। 

नौकरों की तरह काम आने वाले ये बुजुर्ग जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर बेबस और बेसहारा नजर आते हैं। बुढ़ापा मायूस है, एक ओर पड़ा है। जानते हैं हम तपेगा आखिरी सांस तक। वह भुगत रहा है जिंदगी को लेकिन यह बुढ़ापे की नियति बन रहा है कि वह तड़पे क्योंकि अपने ऐसा ही चाहते हैं।

-हरमिन्दर सिंह चाहल.

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