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सफरनामा : गजरौला से बिजनौर -1

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बरसात के कारण नजीबाबाद जाने वाली पैसेंजर लेट थी। गजरौला से सुबह चलने वाली गाड़ी नौ बजे तक स्टेशन पर खड़ी थी। मैंने ड्राइवर से देरी का कारण जानना चाहा। उसने "ऊपर से आदेश" नहीं आने की बात कही। लेकिन गाड़ी किसी भी वक्त चल सकती है- जब आर्डर मिलेगा। 

पैसेंजर का समय सुबह साढ़े सात के आसपास का है। लेकिन वह यहां से आठ के करीब ही जाती है। चूंकि गाड़ी गजरौला से चलती है इसलिये यात्रियों को जगह आसानी से उपलब्ध हो जाती है। इनमें अधिकतर गांव-देहात के लोग होते हैं जो अक्सर बिना टिकट लिये बैठते हैं। उन्हें मालूम है कि इतनी सुबह चैकिंग नहीं होता। वैसे भी ज्यादातर लोग अगले स्टेशन पर उतरने वाले होते हैं। ट्रेन में लोग आते रहते हैं, और गाड़ी रूकने के साथ जाते रहते हैं। न अधिक भीड़, न अधिक शोर। उन लोगों का कुछ नहीं किया जा सकता जिन्हें गेट के पास खड़े होने की आदत है। ऐसे यात्री ज्यादातर छात्र होते हैं। वे भी बिना टिकट यात्रा करने के लिये जाने जाते हैं। टी.टी. उन्हें कुछ कह नहीं सकता क्योंकि वे स्कूल/कालेज की यूनीफार्म पहने होते हैं तथा गुट में होते हैं। 

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मैं टिकट खिड़की की ओर दौड़ना चाहता था लेकिन रूक गया कि कहीं ट्रेन छूट न जाये। ऐसा हो सकता था क्योंकि ड्राइवर ने स्वयं माना था कि वह किसी भी समय चल सकता है। यदि यह ट्रेन छूट जाती तो मुझे घंटा भर से अधिक इंतजार करना पड़ता। बारिश लगातार हो रही थी। रात ग्यारह बजे से सुबह के नौ बज चुके थे, लेकिन बूंदें कम नहीं हुई थीं। सफेद कमीज पहने एक व्यक्ति से मैंने पूछा कि टिकट खिड़की पर ज्यादा भीड़ तो नहीं। मैंने उससे इसलिये पूछा क्योंकि वह उसी ओर से आ रहा था। उसने कहा कि टिकट लेने की जरूरत नहीं। अगले दो डिब्बे स्टाफ के हैं -पुलिस और रेलवे कर्मियों के। उसने सामने से आते एक पुलिसकर्मी से मुझे मिलवाया और कहा कि टिकट के पैसे इन्हें दे दो। ट्रेन ने पहली सीटी दी। पुलिसवाले ने मुझसे कहा पच्चीस रूपये दीजिये। मेरे पास छुट्टे नहीं थे। मैंने उसे पचास का नोट दिया। उसने आधे वापस कर दिये। टिकट कम पैसे में हो गया था। किसी भी यात्री के लिये यह हर्ष की बात होती लेकिन मेरे लिये नहीं थी क्योंकि मैंने ये बाद में महसूस किया। जो व्यक्ति मुझे पहले मिला था मैं उससे एक सीट छोड़कर बैठा। उसने कहा भी था कि यदि कोई समस्या आये तो मैं संभाल लूंगा।

यह हैरानी वाली बात थी कि हम एक ओर रेलवे को घाटे से उबारने की कोशिश में लगे हैं। वहीं दूसरी ओर कुछ लोग मजबूरी का लाभ उठाकर रेलवे को चूना लगा रहे हैं। उसमें काफी हद तक हम भी जिम्मेदार है। बाद मैं मैंने खुद महसूस किया कि जो मैंने किया वह गलत था। वह एक तरह की रिश्वत ही समझी जा सकती है जो देशहित में बिल्कुल नहीं है। क्या जाता, गाड़ी छूट जाती। घंटा भर बाद दूसरी आ जाती। कम से कम गलत काम होने से तो बच जाता। जो पैसा सरकार के खाते में जाना चाहिये था वह एक भ्रष्ट पुलिसवाले की जेब में गया। इसी तरह रोज करोड़ों रूपये रेलवे को नहीं मिल पाते, भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाते हैं। इनमें बिना टिकट यात्रा सबसे बड़ा कारण है। साथ ही रेलवे कर्मियों के परिवार व उनके सहयोगी भी लाखों की संख्या में रोज यात्रा करते होंगे। 

-जारी है अगले अंक में भी ...

-हरमिन्दर सिंह चाहल.

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