दांतों का डाॅक्टर और घबराहट


जब मैं पहली बार दांतों डाॅक्टर के पास गया तो घबराया हुआ था। मैं जानता था कि इसमें कोई भय की बात नहीं, लेकिन एक बच्चे के लिए थोड़ा भय जरुर रहता है। मामला दांतों का होता है और सूई की बात जरुर आती है। सूई से डर नहीं था क्योंकि सालों पहले मेरा पैर साईकिल में रगड़ खाया था, टिटनेस न हो जाये इसलिए सरकारी अस्पताल में इंजेक्शन लगाया गया था जिसे लगवाते समय मैं मुस्करा रहा था।

दांतों के डाॅक्टर से मेरा परिचय हुआ। उसकी मुस्कान मैं नहीं भूल सकता। किसी ने बताया था कि डाॅक्टर इसलिए मुस्कराते हैं ताकि मरीज को घबराहट न हो। वैसे भी मुस्कान से आधी घबराहट कम हो गयी थी मेरी। यानि पचास प्रतिशत घबराया था मैं उस समय।

मेरी नजर वहां रखे उपकरणों पर पड़ी। उन्हें मैं ठीक से समझ नहीं पाया था जब भी, आज भी मेरा हाल वैसा ही है। केवल नजरभर देखा, उसके बाद उनको अपने दिमाग से छू-मंतर कर दिया। ऐसे उपकरणों को जेहन में रखने से कोई लाभ नहीं क्योंकि भविष्य में आप इनका प्रयोग करने वाले हैं नहीं, फिर क्यों दिमागी डाटा भरा जाये।

दो महिलायें आयीं। एक बूढ़ी थी जिसका चेहरा देखकर यकीन से कहा जा सकता था कि उसके दांत में दर्द है। उसने अपना हाथ अपने गाल पर रखा था। थोड़े-थोड़े अंतराल पर वह उसे अजीब सा चेहरा बनाकर हटाती रहती। उधर मेरा मुंह खुला हुआ था। डाॅक्टर मेरा चैकअप करने में व्यस्त था। टार्च से उसने मुंह के सारे अंधेरे को एक पल में मानो मिटा दिया था। तबतक मेरे सामान्यपन का ग्राफ 80 प्रतिशत तक पहुंच चुका था, घबराहट केवल बीस प्रतिशत रह गयी थी।

चैकअप हो चुका था। अगली बार मुझे पांच दिन बाद उसके पास आना था। बूढ़ी महिला तुरंत डाॅक्टर के पास पहुंच गयी। लगता था उसका दर्द बेकाबू होता जा रहा था। मैं वहां से चला आया।

पांच दिन के बाद मैं बिना घबराये दंत चिकित्सक के पास पहुंचा। उसकी मुस्कान उसी तरह थी। इस बार उसने दवाईयां लिखीं। हिदायत दी कि ज्यादा ठंडे और ज्यादा गर्म से परहेज करो। ऐसा मैं हमेशा करता आया हूं। चाय के बारे में पहले मेरे ख्याल अलग थे, अब अलग हैं, लेकिन अधिक गर्म चाय मैंने कभी पी नहीं।

मेरी घबराहट बिल्कुल समाप्त हो चुकी थी। अब मुझे दांतों के चिकित्सक के पास जाने से कोई घबराहट नहीं होती। एक बात मैं जरुर कहना चाहूंगा कि डाॅक्टर मुस्कराता हुआ ही अच्छा लगता है।

-हरमिन्दर सिंह चाहल.

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