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बुढ़ापे में अपनों का साथ



थकी काया को लेकर कहां चलूं समझ नहीं आ रहा। मैं चप हूं। बिना शब्द बोले मैं एक कोने का सहारा लिये हूं। यह मुश्किल दौर की तरह है। उससे एक कौड़ी भी कम नहीं। हां, बहुत अजीब वक्त है। मुझे तसल्ली है कि मेरे अपने करीब हैं।

मेरी नहीं हर किसी को इस उम्र में चीजों को समझने में दिक्कत आती है। हर कोई इसे यूं ही बुढ़ापा नहीं कहता। उम्र आपको पुरानेपन का अजीब सा अहसास दिलाती है। लगता है जैसे हर दिशा कमजोरी छाई है। 

उदासी का सैलाब जब निकलता है तो बताता नहीं, लेकिन उम्रदराजों का जीवन खुद किसी उदास सैलाब से कम नहीं होता। जीवन का सच जानना है तो बूढ़ा होना पड़ेगा।

क्या करें बूढ़ा ऐसे नहीं होया जाता। दिन ढलते हैं। शाम होती है और सवेरा छंट जाता है। यही बुढ़ापा है।
जर्जरता को ओढ़कर चलने का आनंद अलग है। क्यों कहें कि बुढ़ापा जी दुखाता है। मन को परेशान करता है। वक्त को जरा सुस्ती से काटने पर विवश करता है बुढ़ापा। इतना ही नहीं शरीर को हर काम करने में समय चाहिये। जल्दी नहीं है। आराम से चीजों को सलीके या बेसलीके से लगाने का इंतजाम है बुढ़ापा।

बुढ़ापा बहुत कुछ है। ज़रा समझिये उन्हें जो आपके अपने हैं। मैं अपनों से दूर नहीं, न वे मुझसे।

बुढ़ापा हर किसी को आना है। गौर कीजिये कि किसी अपने को आपकी कितनी जरूरत है।

उदाहरण बनिये आने वाली पीढ़ी के लिये क्योंकि जब आप बूढ़ें होंगे तो कोई अपना होना चाहिये करीब।

-हरमिन्दर सिंह चाहल.

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