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बुढ़ापा ही था वह

उनकी आवाज़ अब कांपती है। उनके चेहरे को देखकर स्पष्ट कहा जा सकता है कि वे जवान नहीं हैं, वे बूढ़े हैं। बुढ़ापा उनसे लिपट गया है। वे चाह कर भी उससे बच नहीं सकते।

चेहरे को झुर्रियों से बचाने की उन्होंने कभी कोशिश भी नहीं की क्योंकि वे जानते थे कि बुढ़ापा भी सच्चाई है। वे 80 साल के एक किसान हैं जो अपने बच्चों के साथ शहर में रहते हैं। उनका नाम वीरेश सिंह है। नाम का मतलब वे नहीं जानते लेकिन सिंह शेर को कहते हैं यह उनका पोता झट से बता देता है।

बुढ़ापे पर विमर्श के दौरान वीरेश जी ने कहा-"मानो उम्र रूक सी गयी है। ऐसा लगता है कि इसके बाद कुछ नहीं। बोलते हुए लगता है कि कुछ अड़चन है। हाथ भी आवाज़ की तरह कांपते हैं। यही उम्र का तकाज़ा है, यही बुढ़ापा है।"

उन्होंने आगे कहा-"जिंदगी यहां थोड़ा नहीं, बिल्कुल हैरान कर रही है। कई लोग कहते हैं कि चुप रहो, सठिया गये हो, बगैरह-बगैरह। मैं चुप नहीं बैठ सकता। उम्र पुरानी हुई तो क्या बोलने पर भी ताला लगा लें।"

मैंने उनके साथ चाय पी। कप पर उनकी पकड़ ढीली नहीं थी, मगर हाथ बीच-बीच में कांप जरूर रहे थे। गर्दन को सीधा रखने में शायद उन्हें मुश्किल हो रही थी। जब वे हंसते तो काफी देर तक हंसे जाते। वह फूहड़पन नहीं था, उम्र के कारण उपजा था। वह बुढ़ापा ही था जो इंसान से लिपटा था, उसे विवश किये हुए था।

-हरमिन्दर सिंह चाहल.

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