Header Ads

सिर्फ साथ नहीं हैं हम

vradhgram aged man
























दुख होता है जब बुढ़ापे को ठसक लगती है। उसे सबकी चिंता है, उसकी किसी को नहीं। वह आज भी अपनों के मोह में जकड़ा है। अपने उससे कब की दूरी बना चुके। मोह का खेल पुराना है। बच्चों को खुश देखकर वृद्ध खुश हैं। अपनों की खुशी ऐसी ही होती है
-----------------------------------------------------------------------------------------------------

कौन कहता है बूढ़े कमजोर हैं? नहीं है ऐसा, बस हालातों ने उन्हें ऐसा बनाया है। उनकी स्थिति कभी खराब न हो, यदि बुढ़ापा उन्हें न घेरे। हम जानते हैं कि उनमें अनुभव भरा है, उनमें सीखों का भंडार है और वे ही नई पीढ़ी का उचित मार्गदर्शन कर सकते हैं। फिर क्यों हम उनसे किनारा करने की कोशिश करते हैं?

समस्या नौजवान पीढ़ी में है। समस्या संस्कारों में है, तभी व्यवहार बदल रहे हैं। जनरेशन गैप एक बहाना भर है। मेरे नाना और दादा मेरे लिए मित्र की तरह हैं। जितने वृद्धों से मेरी मुलाकात होती है, वे मुझसे और मैं उनसे घुलमिल जाता हूं। होना भी यही चाहिए। बूढ़े हमसे अलग नहीं हैं। उनके साथ हमें उतनी ही खु्शी का अनुभव करना चाहिए जितना हम नौजवान आपस में करते हैं। फिर देखिये जीवन में आपको बदलाव के संकेत मिलते हैं कि नहीं।

बुजुर्गों से उनके जीवन के अनगिनत पहलुओं पर चर्चा बहुत कुछ सिखा सकती है। उन्होंने जीवन को काफी जी लिया। संसार छोड़ने से पहले हम उनके अनुभवों को जरुर जानें।

बुजुर्गों का हौंसला हमसे अधिक होता है। वे इतना सहते हैं, पर चुपचाप रहते हैं। यहीं आकर ज्ञान होता है कि बुढ़ापे को कितना सब्र है। बर्दाश्त करने की भी कोई हद होती है, लेकिन बुढ़ापा अंतिम समय तक बर्दाश्त ही तो करता है।

वृद्धों की आंखें सारा नजारा देखती हैं, बिना किसी से कुछ कहे। कहकर फायदा ही क्या? उधर नया खून कुलाचें मारता है। मालूम है कि बुढ़ापा राह देख रहा है, लेकिन खुली आंखें धुंधली नहीं और जानकर अनजान बन रही है जवानी।

दुख होता है जब बुढ़ापे को ठसक लगती है। उसे सबकी चिंता है, उसकी किसी को नहीं। वह आज भी अपनों के मोह में जकड़ा है। अपने उससे कब की दूरी बना चुके। मोह का खेल पुराना है। बच्चों को खुश देखकर वृद्ध खुश हैं। अपनों की खुशी ऐसी ही होती है।

प्रेम और इतना प्रेम छलकता है उनकी आंखों से। कुछ बूंदें इतराती-सी गिर पड़ती हैं आंचल में। प्रेम के मायने तब समझ आते हैं।

हर समय तैयार है बुढ़ापा अपनों के लिए। उन्हें मरते दम तक समृद्ध करने की कोशिश में, ताकि उन्हें दुख न हो। चाहें वह कितनी पीड़ा सह जाए।

जीवन कितना लंबा है, यह सोचने की जरुरत नहीं। जीवन में किया क्या जाए, महत्व यह रखता है। हमारे बड़े-बूढ़े थक कर भी हमारे साथ हैं, सिर्फ साथ नहीं हैं हम।

-Harminder Singh



5 comments:

  1. बहुत बढ़िया ..सोचने पर विवश करती हुई प्रस्तुति

    ReplyDelete
  2. बर्दाश्त करने की भी कोई हद होती है, लेकिन बुढ़ापा अंतिम समय तक बर्दाश्त ही तो करता है।

    आपकी अमृत वाणी मैंने सहेज ली है .....!!बहुत सार्थक आलेख ....!! सादर ..आभार.!!

    ReplyDelete
  3. सोचने को विवश करती बेहद सटीक और सार्थक अभिव्यक्ति. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

    ReplyDelete
  4. कल-शनिवार 20 अगस्त 2011 को आपकी किसी पोस्ट की चर्चा नयी-पुरानी हलचल पर है |कृपया अवश्य पधारें.आभार.

    ReplyDelete